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जय जाम महोत्सव

लोकतंत्र में ‘जाम’ के जप और ‘बंद’ की वंदना की महती महत्ता है। जो इस काम में तन-मन-जन से तल्लीन होते हैं, उन्हें देर-सबेर पुण्य प्रसाद अवश्य प्राप्त होता है। कीर्तन, जागरण, भजन, भंडारे की तरह जामोत्सव का आयोजन भी एक धार्मिक कर्म है। तभी तो भारत बंद, रेल रोको, चक्का जाम आदि के आयोजन धार्मिक सरोकारों के लिए भी संपन्न होने लग गए हैं। जब भी चक्का जाम होता है, इतने पहियों की हवा निकाली जाती है कि पुलिस-प्रशासन की हवा-हवाई व्यवस्था की हवा खिसक जाती है। इसका सात्विक लाभ यह होता है कि अच्छे-अच्छों को अपने-अपने भगवान याद आ जाते हैं। जो भी जाम में फंसता है, वह ही भगवान भरोसे होता है। सुबह का निकला, जाम में अटका तो शाम को राम-राम करता अपने घर पहुंच पाता है। अल्लाह का नाम ‘राह’ तलाशन के काम में आने लग पड़ता है। रोड रोको और सड॥क जाम जैसी एक्िटविटीज को लेकर प्राय: अच्छी धारणा नहीं पाई जाती, जबकि इनका पहला और प्रत्यक्ष लाभ तो यह ही है कि लोग डर के मारे अपने घरों से नहीं निकलते। इस तरह व कम-से-कम एक दिन अपनी फेमिली के साथ रहते हैं। चक्का जाम के डर से बस, ट्रेन, सार्वजनिक वाहन नहीं चलते। कार, स्कूटर, मोबाइक, मोपेड वाले डर के मारे अपनी गाड़ियां घरों में पार्क करके रखते हैं। जो गलती से चक्का जाम में फंस भी जाते हैं, वे भी अपनी गाड़ियां रोड के किनारे खड़ी करके प्रभु का स्मरण करते हैं- हे ईश्वर, आज उबार लो। ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। इस तरह उस दिन करोड़ों रुपयों के डीजल-पेट्रोल की बचत तो होती ही है, लोगों में भगवत्भक्ित का संचार भी होता है। नास्तिक की भी धरम-करम में आस्था जागती है। रोगियों की रक्षा डॉक्टर नहीं, भगवान करता है। कितनों की तो वह भी नहीं कर पाता। चक्काजाम के और बेनेफिट्स भी हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की एबसेंस में दूर के किसी संबंधी के आन की पॉसिबिलिटी जीरो हो जाती है। लोग चिंतामुक्त रहते हैं। स्थानीय राजनीतिक वर्कर्स को टेंपरेरी रोजगार हासिल होता है। पोटेंशिएलिटी की परख होती है। बड़े लीडरान के करियर में उछाल आता है। मीडिया को मशक्कत का मौका मिलता है। पुलिस की हाथों की खुजली मिटती है। और तो और, असामाजिक तत्वों को भी ऐसा एक दिन मिलता है कि वे हरेक से नजरें मिला पाते हैं और अपने हुनर का खुला प्रदर्शन करते हैं। जनता की ख्वाहिश है कि ऐसा फेस्टिव आयोजन डेली न सही, तो सप्ताह में कम-स-कम एक दिन अवश्य होना चाहिए।

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