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काश, पूछो कि मुद्दआ क्या है?

पिछले हफ्ते 27 नवम्बर को मध्य प्रदेश में चुनाव का आखिरी दौर था। एक खबरची चैनल ने एगिट पोल की व्यवस्था की थी। उसके एक रो पहले ही मुम्बई पर आतंकी हमला हो गया। राम जाने पोल हुआ या नहीं, पर चैनल के पास उसे प्रसारित करने का वक्त नहीं था। 26 को भी रात के साढ़े दस बजे तक चैनल आतंकी हमले को लेकर परेशान नहीं थे। वहाँ तो भारतीय क्रिकेट टीम की जीत ब्रेकिंग न्यूज थी। दो-एक चैनलों में अचानक एक खबर स्क्रॉल करने लगी कि मुम्बई में गोली चली है। शायद दो गुटों के बीच का झगड़ा है। शायद गेटवे ऑफ इंडिया पर है। सीएसटी पर, शायद ट्रायडेंट में। धीर-धीर स्क्रॉल करते अक्षर बड़े होने लगे। उसके बाद की कहानी हमें पता है, बहरहाल। एक्िाट पोल का क्या हुआ? चुनाव में क्या हुआ? अचानक आडवाणी जी मनमोहन सिंह के साथ खड़े नजर आने लगे। आतंक-विरोधी कार्रवाई में राष्ट्रहित सवरेपरि है। एसा सुखद माहौल 24 घंटे से ज्यादा कायम नहीं रहा। धीर-धीर सब सामान्य होने लगा। देश की वास्तविक चिंताओं ने हमें फिर से घेर लिया। देश की वास्तविक चिंता क्या है? 1ी बात है। उस वक्त उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार थी। मंदिर-मसिद विवाद के दिन थे। मसिद के गुम्बद को तोड़ने की एक कोशिश साल भर पहले हो चुकी थी। प्रदेश की नई सरकार से राबिता कायम करने अमेरिका के राजदूत अपनी टीम के साथ लखनऊ आए थे। शहर के पत्रकारों को उन्होंने अनौपचारिक बातचीत के लिए बुलाया। अमेरिकी टीम के किसी सदस्य ने पूछा, प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? पत्रकारों का एक स्वर से जवाब था, साम्प्रदायिकता, बाबरी-विवाद। सवाल करने वाले ने फिर सवाल किया, इसका मतलब यह कि पिछड़ापन, गरीबी और निरक्षरता आपकी सबसे बड़ी समस्याएं नहीं हैं? ये वे दिन थे जब अमेरिकी दूतावास भारतीय भाषाओं के पत्रकारों से संवाद करने लगा था। राबिन राफेल और एंडरसन वगैरह भगवा ब्रिगेड के सम्पर्क में थे। एसा लगता था कि भाजपा बड़ी ताकत बनकर कांग्रेस के विकल्प के रूप में आ रही है। इस बातचीत के कुछ महीने बाद बाबरी मसिद टूट गई और भाजपा अछूत पार्टी बन गई। 1े लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आने के बावजूद शिवसेना के अलावा उसका साथ देने कोई आगे नहीं आया। प्रधानमंत्री के रूप में भी उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी का अपेक्षाकृत उदार चेहरा था, जिन्होंने बाबरी विध्वंस पर प्रतीकात्मक ही सही, खेद जताया था। पचास के दशक में क्षेत्रीयता, साठ के दशक में उसका ही दूसरा रूप भाषा, सत्तर के दशक में आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव यानी क्षेत्रीय अस्मिता, अस्सी के दशक में अलगाववाद, फिर पिछड़ी जातियों का उभार, फिर मंदिर, फिर दलित चेतना। यह सूची जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। और इस हफ्ते हमें लग रहा है कि आतंकवाद हमारी सबसे बड़ी चिंता है। आतंक के मर्म में कोई कौमी रोष छिपा बैठा है। हिन्दी सिनेमा का एक पूरा दौर अन्याय के हिंसक प्रतिकार की प्रतिष्ठा के रूप में गुजरा। जब नायक मशीन गन लेकर जन-प्रतिनिधियों की सभा को भून डालता है। टीवी पर हमार सबसे ज्यादा देखे जाने वाले सीरियल या तो असामान्य स्त्री पात्रों से जुड़े हैं या अपराध की सनसनी से। हमारी चिंता, जिसे अंग्रेजी में कंसर्न कहें, इसके बाद ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट है। एकमात्र मोर्चा जिसमें हम सम्मान हासिल कर पाए। और यह सब असल समस्या से भागना है, द ग्रेट एस्केप। अगले सोमवार को पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आएंगे। इस महीने के अंत में कश्मीर के। दोनों सियासतों के मसले अलग हैं। हम एसा ही मानते हैं। पर क्या कश्मीरियों की परशानी भी वही नहीं है, जो हमारी है? क्या पाकिस्तान के कबायली इलाकों की परशानी भी वही नहीं है, जो हमारी है? फटेहाली, अन्याय और नॉन गवनेर्ंस। पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर से लेकर भारत के नक्सली इलाकों तक जिन हाथों में बंदूकें हैं, उन्हें नहीं मालूम कि वे इसके अलावा और क्या कर सकते थे। पर क्या यह बात कभी हमार चुनावों का मुद्दा बनी? पार्टियों के मैनिफेस्टो, प्रचार और विज्ञापनों को देखे तो पता लगता है कि एक इस बात से परशान है कि फलां पार्टी ने दिल्ली की बीन बजा दी और दूसर को लगता है कि सारे धमाकों की जड़ फलां पार्टी है। वोट जीतने के लिए एसा दुनिया भर में होता है। ओबामा और हिलेरी के बीच डैमोक्रेटिक पार्टी का प्रत्याशी बनने के लिए कैसा गलाकाट संग्राम हुआ था? फिर भी हमारी और उनकी तुलना नहीं हो सकती। वह समाज हमार समाज से ज्यादा समृद्ध, सजग और जानकार है। वहां पारदर्शिता के मानक हमार समाज से बेहतर हैं। उनके यहाँ कई तरह के संगठन और संस्थाएं हैं, जो लोगों को रास्ते दिखाती रहती हैं। अमर्त्य सेन की स्थापना है कि जहाँ लोकतंत्र लोकतंत्र होता है वहाँ अकाल नहीं होते। इस बात को और आगे बढ़ाया जा सकता है। जहाँ लोकतंत्र है वहाँ अशिक्षा, अभाव और अन्याय भी नहीं होंगे। इस अर्थ में लोकतंत्र एक वैक्सीन है, जो अलोकतांत्रिक बीमारियों को रोकती है। यह वैक्सीन शॉट-सप्लाई है और इसकी कोल्ड चेन बार-बार टूट जाती है। एसा न होता तो चुनाव प्रचार तमाशा न बनता। पतुरिया नाच से भीड़ जमा करना, दारू बँटवा कर वोट पाना जसे इंफैक्शन इस बीमारी की जड़ हैं। इसका इलाज राजनैतिक शिक्षा है। एसे संगठन और एसे कार्यकर्ता जो सामान्य वोटर को मुद्दों के इर्द-गिर्द जमाए रखें, इसके लिए जरूरी हैं। उनकी दो-तरफा जिम्मेदारी है। अचानक हमें लगता है कि आतंक हमारी समस्या है। आतंकवाद एक राजनैतिक विचार के रूप में कायम है तो उसकी जड़ों को तलाशना चाहिए। उससे फौा नहीं, जागरूक जनता ही लड़ सकती है। और वही राजनीति को दलालों के हाथों जाने से रोक सकती है। राजनीति भी कम से कम दो तरह की हैं। एक, जनता को जागरूक बनाने वाली और दूसरी जागरूक बनने से रोकने वाली। जागरूक जनता स्वार्थी राजनीति को भला क्यों पलने देगी? चुनाव का चालू दौर बेटों-भतीजों को टिकट देने और काटने के झगड़ों से शुरू हुआ। और अगले हफ्ते देखिएगा, जब सरकार बनाने की मारकाट होगी। राजनैतिक कार्यक्रम और गवर्नेस सिर से गायब है। हम कितनी भी आदर्शभरी बातें करं, साधनहीन उम्मीदवार इस व्यवस्था में जीतकर नहीं आता। उसके लिए दूसरी तरह की राजनैतिक संस्थाओं की जरूरत है। बहुत निराश होने की जरूरत नहीं। आप जसा सोचने वालों की तादाद बहुत बड़ी है। उन्हें साथ लाने और ताकतवर बनाने की जरूरत है। लेखक हिन्दुस्तान दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।ं

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