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पेंशन के पेंच

जिस देश में बहुसंख्यक कामगार असंगठित क्षेत्र में काम करते हों और जहां नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा लगभग गैरहाजिर हो, वहां ऐसे हर निवेश विकल्प का स्वागत किया जाना चाहिए, जो बुढ़ापे में लाठी थमाने का वादा करता हो। ‘पेंशन फंड नियामक व विकास प्राधिकरण’ की नई पेंशन स्कीम इस लिहाज से एक अच्छा कदम है। उसकी बदौलत निवेशकों को जोखिम के अलग-अलग स्तरों के विकल्प देने वाला पेंशन फंड मिल रहा है, जिसके पास एक नियामक प्राधिकरण का भरोसेमंद आश्वासन भी है। ज्यादा सुरक्षा चाहने वाले बचतकर्ताओं के लिए सरकारी प्रतिभूतियों और कार्पोरट बांडों में निवेश वाले विकल्पों की मौजूदगी इस स्कीम को संतुलित बनाती हैं। पेंशन के लिए जमा कराए जाने वाले धन को शेयर बाजार या वृहतर पूंजी बाजार में निवेश के लिए इस्तेमाल किया जाए या नहीं, इस पर कई वर्षो से बहस हो रही है। लेकिन चूंकि दुनिया के कई देशों में पेंशन फंड सक्रिय हैं और चूंकि सूचना तकनीक ने शेयर बाजार में घोटालों की पुनरावृति को कठिन बना दिया है, यह बहस इधर कुछ मंद पड़ गई है। वक्त बदल चुका है और अब शेयर बाजार और सट्टा बाजार एक दूसरे के पर्याय नहीं रहे। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए ऐसी ही एक पेंशन स्कीम पहले से चालू है और उसका अनुभव भी कोई बुरा नहीं रहा है। इसलिए शेयर बाजार और नई पेंशन स्कीम के कोष के रिश्ते को लेकर आलोचना का अब कोई खास अर्थ नहीं बचा है, बल्कि ताजा शिकायत यह उभर रही है कि इस स्कीम के सबसे अधिक निवेश जोखिम वाले विकल्प में इक्िवटी में निवेश की सीमा 50 फीसदी क्यों रखी गई है और उन निवेशकों का क्या होगा, जो भरपूर रिटर्न के लिए इससे भी ज्यादा जोखिम उठाने का माद्दा रखते हैं। बहरहाल, इक्िवटी में निवेश की सीमा से भी बड़ा मुद्दा यह है कि इस स्कीम से पैसा निकालने पर टैक्स वसूलने का प्रावधान रखा गया है, जबकि पीपीएफ, ईपीएफ वगैरह से पैसा निकालने पर टैक्स नहीं लगता। नई पेंशन स्कीम का यह पहलू केलकर समिति रिपोर्ट के खिलाफ जाता है, जिसमें सभी दीर्घकालिक बचत योजनाओं के लिए एक जसे टैक्स ट्रीटमेंट की बात कही गई थी। टैक्स प्रावधानों की यह विसंगति इस स्कीम की लोकप्रियता के रास्ते का बड़ा कांटा साबित हो सकती है।ं

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  • Web Title: पेंशन के पेंच