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बुलंद इमारत से बर्बाद बुत बना ताज

एक जीती जागती, हंसती-खिलखिलाती इमारत में इतने बम फटे कि वह बर्बादी का बुत बन गई। इस इमारत के सामने खड़े होकर लोग हंसते चेहरों के साथ फोटो खिंचवाते थे। तस्वीरंे आज भी खिंच रही हैं पर अद्भुत निर्माण नहीं भयावह विध्वंस की। मुंबई की पहचान होटल ताज को अपने उन्मादी रंग रूप में आने में अभी चंद महीने लग सकते हैं पर उससे पहले वह आतंक की निशानी के तौर पर लोगों के कौतुहल का पात्र रहेगा। लोग आज भी ताज को देखने आ रहे हैं पर उसकी खूबसूरती निहारने नहीं बल्कि उसकी दीवारों पर आतंक की छाप देखने। रविवार की रात होटल के बाहर लोगों की जबरदस्त भीड़ उमड़ी हुई थी। सब एक-दूसर को उंगलियों से इशारा कर कुछ न कुछ दिखा रहे थे। खबरिया चैनलों पर लगातार दिखाए गए हिस्से को लोग बड़े कौतुहल से देख रहे थे। कछ लोग टूटे हुए हिस्सों अथवा वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों की तस्वीरं उतार रहे थे तो कुछ बस मूक बने उसे निहार रहे थे। देखने लायक और भी बहुत था। सड़क के किनार लगी गोलियों से छलनी मर्सडीा-बेंज कार, जिसकी तकरीबन सार शीशे टूटे हुए थे। हेरिटेा हिस्से की कुछ खिड़कियां अब खिड़कियां न दिखकर दीवार में बड़े छेद जसी दिख रही थीं। तकरीबन ढाई दिन तक लगातार टीवी पर आतंकी तमाशा देखने वाली कामिनी सेठ ने कहा, ‘जब सब खत्म हो गया, मैं अपनी बेटी को होटल दिखाना चाहती थी।’ कामिनी ने एक-दूसर के पीछे छिपती बच्चियों की ओर इशारा करते हुए कहा। वह बोलीं, ‘मेरी बड़ी बेटी इतनी डरी हुई थी कि वह घर से निकलना नहीं चाहती थी, लेकिन मैं वहां जाना चाहती हूं, मोमबत्ती जलाना चाहती हूं और उस जगह को भी देखना चाहती हूं।’ और जसा की हर पर्यटन स्थल के आसपास होता है, यहां भी गाइड जसे लोग नजर आए। खुद को सरकार की ‘समन्वय समिति’ का सदस्य कहने वाले दिग्विजय गायकवाड़ लोगों की उत्सुकता शांत कर रहे थे। लोगों के एक छोटे से झुंड़ को गायकवाड़ बता रहे थे, ‘जो कुछ आपने टीवी पर देखा वो सब गलत था। मैं वहीं था। मैं जानता हूं वहां क्या हुआ। उदाहरण के लिए जसा की कुछ चैनलों ने कहा कि आतंकवादी मृत नागरिक की एक्िटंग कर सेना को फंसा सकते हैं। ये भी सच नहीं है। ये सब चैनल की रटिंग बढ़ाने के लिए किया गया था।’

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