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राजरंग

बाबा का बगान और साहब की खेतीड्ढr पहले हम भी किसान थे। खेती करने में बड़ी मजा आता है। तभी तो पुलिस की नौकरी छोड़ नौकरशाह बने। अभिओ जहां भी समय मिलता है, खेती-बारी शुरू कर देते हैं। बाबा को भी खेती-बारी पसंद है। राज्य के मुखिया हुए हैं, सो उन्हें आलीशान बंगला मिला है। बंगला के साथ-साथ बड़का गो बागीचा भी है। राजधानी में सदर के अक अफसर हैं, जो बाबा के एकदम प्रिय हैं। खेती-बारी का नाम सुनते ही उनकी खुशी दोगुनी हो जाती है। अपने घर को भी साग-सब्जी की खेती से सजाकर रखा है। अफसर ने बाबा को एक दिन आलू की खेती की सलाह दे डाली। खाली सलाह भर नहीं दिया, उसमें अपना पूरा योगदान भी दिया। बाबा के लिए इ सब तो छोटा-मोटा सेवा-कर्तव्य है। इसके लिए कुछो थोड़े चाहिए, बाबा का सिर्फ आशीर्वाद चाहिए। बाबा भी तो सबके मन की बात जानबे करते हैं। अफसर के काम-काज से खुश हो मन ही मन बोले, अर एकदम से आशीर्वादे है। तभे न रांची का साहब बनाकर यहां लाये हैं। सदर के अफसर ने ट्रैक्टर चढ़कर बाबा का खेत तैयार कर दिया। साहेब ने कम समय नहीं, चार घंटे तक ट्रैक्टर चलाया। जब घर पहुंचे, तो काफी थके-थके से थे। सो गये और सपने में भी बाबा, बाबा पुकारने लगे। इधर बाबा के बागान में अब आलू की फसल लहलहाने लगी है।

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