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कुछ लम्हे जीवन के पन्नों से

कुछ लम्हे जीवन के पन्नों से

गाता रहे मेरा दिल

मैं बात 2007 की कर रहा हूं... थोड़े बहुत गतिरोधों के बावजूद यूपीए सरकार चल रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था भी सही रास्ते पर है। वृद्धि दर 9 प्रतिशत और उसके ऊपर है। देश अपनी आजादी की साठवीं सालगिरह का जश्न मनाने की तैयारियां कर रहा है।

हमारे शहर विशाल से विशालतर होते जा रहे हैं। गगनचुंबी इमारतें और ऊंची होती जा रही हैं। झुग्गी-झोपड़ियां उनके पीछे छिप सी गई हैं। बढ़ते मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग मॉल यह बताने के लिए काफी हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था लगातार अच्छी हो रही है। शो रूम की खूबसूरती बढ़ा रहे आयातित कार और विलासिता संबंधी आकर्षक उत्पाद ग्राहकों को अपनी ओर खींच रहे हैं। तकनीक प्रेमी भारतीय दुनियाभर में देश का नाम रोशन किये हुए हैं।

वहीं यह भी सच है कि इन्हीं संचार माध्यमों ने इनसानों के बीच आपस में नजदीकियां तो ला दी है, पर मानसिक रूप से दूरियां बढ़ा दी है। इस बीच शो बिजनेस जितना चकाचौंध फैला सकता था, उतना फैला चुका है। फिल्म सेंसरशिप भी पहले से काफी उदार हुआ है और हमारे समय का मीडिया भी इस बात की प्रशंसा कर रहा है। इसके लिए छोटे परदे को धन्यवाद किया जाना चाहिए, जिसने उनकी लोकप्रियता को इतना फैलाव दिया है। मैं भी समय के साथ चल रहा हूं।

मैं अपना अधिकतर समय खुद के साथ बिता कर खुश हूं। 2006 में क्रोशिया ने मुझे एक फीचर फिल्म शूट करने के लिए आमंत्रित किया गया था। एक दिन मुझे बोज्नी द्वीप के म्यूजियम में विश्व में असर रखने वाले दो नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू और यूगोस्लाविया के मार्शल टीटू की तस्वीर मिली। मैं उस तस्वीर के सामने खड़ा हो गया और उन दोनों नेताओं के सम्मान में मुस्कुरा कर सलामी दी। तभी मुझे पीछे से मधुर प्यारी सी आवाज सुनाई दी। एक जवान क्रोशियन औरत जो मुझे यहां लेकर आई थी, ‘वह पूछ रही थी- यहां आपको अच्छा लगा मिस्टर देव आनंद?

मैंने उसकी तरफ देखा। वह मुस्कुरा रही थी। मैंने कहा, ‘हां... हां।’
गाता रहे मेरा दिल। मेरा दिल गा रहा था, हमेशा की तरह।
यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत है!
(देवानंद की ऑटोबायोग्राफी रोमांसिंग विद् लाइफ, पेंगुइन वाइकिंग से साभार)

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