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सर के लेट कट ने बदल दी जिंदगी: तेंदुलकर

सर के लेट कट ने बदल दी जिंदगी: तेंदुलकर

दुनिया का प्रत्येक गुरु चाहेगा कि उसका शिष्य सचिन तेंदुलकर जैसा हो लेकिन इस महान बल्लेबाज के शब्दों में वह उनके प्यारे सर रमाकांत अचरेकर का लेट कट (करारा थप्पड़) था जिसके बाद उन्होंने कड़ी मेहनत का महत्व समझा था। तेंदुलकर तब एक मैच खेलने के लिए नहीं आए थे जिसके कारण अचरेकर ने उन्हें थप्पड़ मारा था।

तेंदुलकर और शारदाश्रम विद्यामंदिर से जुड़े रहे 100 अन्य छात्रों ने कल बांद्रा कुर्ला परिसर में अपने प्रिय गुरुजी का 79वां जन्मदिन मनाया। इन छात्रों के इस मिलन में निश्चित तौर पर आकर्षण का केंद्र तेंदुलकर थे। इस अवसर पर अचरेकर के शिष्यों ने अपनी पुरानी यादों को बयां भी किया।

जब यादें ताजा होने लगी तो सिर्फ तेंदुलकर ही नहीं बल्कि अजित अगरकर, प्रवीण आमरे, बलविंदर सिंह संधू, पारस म्हाम्ब्रे, चंद्रकांत पंडित, समीर दिघे सभी पर भावनाओं का ज्वार हावी हो गया। तेंदुलकर ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा कि स्कूल छूटने के बाद मैं लंच के लिए जल्द से जल्द अपनी आंटी के घर जाता था। इस बीच सर मेरे लिए कुछ मैचों का आयोजन करते थे। वह विरोधी टीमों से कहते थे कि मैं चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने के लिए आऊंगा। उन्होंने बताया कि इसी तरह से एक दिन मैच खेलने के बजाय मैं अपने एक दोस्त के साथ वानखेड़े स्टेडियम चला गया। वहां शारदाश्रम इंग्लिश मीडियम और शारदाश्रम मराठी मीडियम के लड़कों के बीच हैरिस शील्ड का फाइनल चल रहा था और मैं अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने वहां चला गया था।

तेंदुलकर ने कहा कि वहां मुझे सर दिखे और हम उन्हें बधाई देने के लिए पहुंच गए। वह जानते थे कि मैंने मैच छोड़ा है लेकिन तब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने उसमें कैसा प्रदर्शन किया। मैंने उनसे कहा कि मुझे लगा कि अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने के लिए मुझे मैच नहीं खेलना चाहिए। तब मेरे चेहरे पर लेट कट (करारा तमाचा) पड़ा। मेरे हाथ में टिफिन बाक्स था जो हवा में तैर गया और उसमें रखा सामना तितर बितर हो गया।

उन्होंने कहा कि तब सर ने मुझे कहा था कि, तुम्हें यहां दूसरों के लिए ताली बजाने के लिए आने की जरूरत नहीं है। इस तरह से खेलो कि दूसरे तुम्हारे लिए ताली बजाएं। उस दिन के बाद मैंने कड़ा अभ्यास किया और काफी घंटे अभ्यास पर लगाए। यदि वह दिन नहीं होता तो शायद आज मैं स्टैंड पर से किसी दूसरे के लिए ताली बजा रहा होता।

इस रात जबकि अचरेकर के शिष्य बता रहे थे कि उनके गुरु ने कब उन्हें तमाचा जड़ा था तब दुनिया के सबसे सफल क्रिकेटर ने थके हुए बिना कई घंटों तक खेलने की अपनी क्षमता का श्रेय अचरेकर को दिया। तेंदुलकर ने कहा कि जब मैं बल्लेबाजी करता था तो सर कभी मुझे शिवाजी पार्क मैदान का चक्कर लगाने के लिए नहीं कहते थे, लेकिन जब मेरा अभ्यास सत्र समाप्त हो जाता था और मैं बुरी तरह थका हुआ होता था तब वह मुझे बल्ले और पैड के साथ मैदान का चक्कर लगाने के लिए कहते थे। मुझे बाद में पता चला कि इससे मुझे कितनी मदद मिली।

अपनी भावनाओं को अक्सर काबू में रखने वाले तेंदुलकर ने कहा कि मैं नहीं जानता कि अब भी मुझमें कितनी क्रिकेट बची है। लेकिन अब तक मैंने जो कुछ हासिल किया उसका पूरा श्रेय अचरेकर सर को जाता है। तेंदुलकर ने इसके साथ ही विनोद कांबली के साथ घटी एक अन्य घटना का जिक्र किया। तब अचरेकर ने मैच के दौरान क्षेत्ररक्षण करते हुए पतंग उड़ाने के लिए बाएं हाथ के इस बल्लेबाज पर तमाचा जड़ा था।

उन्होंने बताया कि विनोद मैदान पर था और पतंग उड़ा रहा थ। मैंने उसे चेताया कि सर उसे देख रहे होंगे लेकिन उसने कहा कि वह सभी जगह देख चुका है और उसे पूरा विश्वास है कि सर यहां नहीं हैं। तेंदुलकर ने कहा कि दिन के आखिर में हम दिन भर की गतिविधियों पर सर की रिपोर्ट पढ़ते थे। उस दिन उसे पढ़ने की बारी मेरी थी। सर मेरे बगल में खड़े थे और विनोद मुझे लगता है कि उनके बगल में खड़ा था। मैं सूची पढ़ने लगा और वहां पर लिखा था, विनोद ने पतंग उड़ाई और तब करारा थप्पड़ खाने की बारी कांबली की थी।

तेंदुलकर ने कहा कि कांबली को तुरंत ही थप्पड़ पड़ गया था। बाद में कांबली और मैं बहस करने लगे कि सर ने इसे कैसे देख लिया था। असल में मैंने देख लिया था कि सर पेड़ के पीछे से देख रहे हैं लेकिन मैंने उसे बताया नहीं। तेंदुलकर ने बताया कि शारदाश्रम के पुराने छात्रों को इकट्ठा करके अचरेकर को चौंकाने की योजना मुंबई के पूर्व क्रिकेटर और तेंदुलकर के दोस्त अतुल रनाडे के साथ बातचीत के दौरान बनी थी।

कई अन्य क्रिकेटरों ने भी बताया कि किस तरह से अचरेकर ने उनका कैरियर संवारने में मदद की। विश्व कप 1983 की विजेता टीम के सदस्य संधू ने बताया कि वह अचरेकर ही थे जिन्होंने उन्हें अपनी इनस्विंगर पर काम करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मैं ऑफ स्पिनर था लेकिन सर ने मुझे इनस्विंगर पर काम करने के लिए कहा। वह प्रतिभा को तुरंत पहचान लेते थे।

इस अवसर पर अचरेकर के लंबे समय तक सहायक रहे दास शिवालकर को एक लाख 25 हजार का चेक भी प्रदान किया गया। 
 

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