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दि डर्टी पिक्चर

दि डर्टी पिक्चर

इस फिल्म में विद्या बालन का एक चर्चित डायलॉग है ‘फिल्में सिर्फ तीन चीजों की वजह से चलती हैं- एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट’। बेशक अगर दि डर्टी पिक्चर में ये तीन चीजें न होतीं तो यह फिल्म इस साल का सबसे बड़ा शगूफा साबित होती और न केवल विद्या बालन, बल्कि इस फिल्म के निर्देशक मिलन लूथरिया, निर्माता एकता कपूर, लेखक रजत अरोड़ा और संगीतकार विशाल-शेखर को भी मुंह की खानी पड़ती।

विद्या बालन और उनके साथी कलाकारों सहित इस फिल्म की पूरी टीम ने इंडस्ट्री को एंटरटेनमेंट का मतलब सही ढंग से समझाने का काम किया है, वरना सी-ग्रेड फिल्मों में आइटम नंबर करने वाली किसी पुरानी एक्ट्रेस की दुखभरी कहानी में भला किसे दिलचस्पी होती। मगर इस दुखभरी कहानी में ट्रेजिडी भी है, इमोशन भी है और ड्रामा भी। साथ में है कलाकारों का बेहतरीन अभिनय और संगीत का टेस्टी तड़का। बोले तो फुल टाइम एंटरटेनमेंट। अब ये फुल टाइम एंटरटेनमेंट फिल्म कैसी बनी, ये देखने वाली बात है।

फिल्म की कहानी यह है कि इंडस्ट्री में अपने सपनों को पूरा करने की चाहत लिए रेशमा (विद्या बालन) को एक कास्टिंग डायरेक्टर मीठी से नमकीन छुरी बनने की सलाह तो दे देता है, लेकिन चांस नहीं देता। उसे ये चांस  एक कामुक गीत पर खुद को कोड़े मार कर हासिल होता है, लेकिन फिल्म निर्देशक इब्राहिम (इमरान हाशमी) को रेशमा का ये अंदाज फूहड़ लगता है और वह उस गीत को फिल्म से निकलवा देता है। फिल्म पिट जाती है तो निर्माता सेल्वी (राजेश शर्मा) रेशमा के उसी गीत को दोबारा डलवा कर फिल्म छोटे शहरों में चलवा देता है। फिल्म पैसा कमाती है और सेल्वी रेशमा को सिल्क (स्क्रीन नेम) बना देता है।

सिल्क को फिर एक बड़ा चांस मिलता है, लेकिन इस बार उसे सूर्यकांत (नसीरुद्दीन शाह) जैसे सुपरस्टार के सामने खुद को परोसना पड़ता है। सूर्यकांत का सहारा मिलते ही सिल्क रुकने का नाम नहीं लेती और इब्राहिम जैसे निर्देशकों के साथ-साथ एक अंग्रेजी मैगजीन की महिला पत्रकार (अंजू महेन्द्रू) की आंखों की भी किरकिरी बन जाती है। सिल्क जितना ऊपर जाती है, उसे नापसंद करने वालों की संख्या उतनी ही बढ़ने लगती है। एक लड़की होते हुए सिल्क फिल्म इंडस्ट्री में हीरो का रुतबा रखने लगती है। जब सूर्यकांत उससे बेवफाई करता है तो वह उसके भाई रमाकांत (तुषार कपूर) को अपना दीवाना बना लेती है। उधर, सिल्क से नफरत करने के बावजूद इब्राहिम भी उसके करीब आने लगता है, लेकिन सिल्क फिर भी खुद को अकेला ही महसूस करती है।

हो सकता है इस समीक्षा को पढ़ते वक्त आपको फिल्म की कहानी ज्यादा अपील न करे, लेकिन जब आप इसी कहानी को परदे पर देखते हैं तो विद्या बालन किसी अखबार की हेडलाइन की तरह लगेंगी, जो हर दूसरे सीन में सनसनी मचा देती है। इमरान हाशमी उस संपादकीय की तरह लगेंगे, जिसमें निष्ठा, कर्तव्य, ईमानदारी और अपने काम के प्रति पैशन झलकता है। नसीर साहब का किरदार आपको फिल्मी मैगजीन के गॉसिप कॉलम की तरह लगेगा, जिसे आप अंदर की खबरों की तरह चटखारे लेकर पढ़ते हैं और तुषार कपूर, राजेश शर्मा के किरदार आपको अखबारों के संक्षिप्त समाचारों की तरह लगेंगे जो होते तो छोटे हैं, लेकिन उनमें रोचक और अहम जानकारी होती है।

फिल्म में विद्या बालन के बेहतरीन अभिनय को अगर रजत अरोड़ा के बेहतरीन संवाद-पटकथा न मिली होती तो शायद रेशमा मीठी ही लगती, नमकीन नहीं। विद्या को अगर निहारिका भसीन खान ने 80 के दशक का उत्तेजक लुक देने में ईमानदारी न बरती होती तो वह एक फूहड़ डांसर भी लग सकती थीं। बॉबी सिंह ने अगर फिल्म को सटीक पीरियड (30 साल पहले का माहौल) लुक न दिया होता तो समीक्षक बखिये उधेड़ने में पीछे न रहते। और फिल्म में अगर ऊ ला ला. गीत और बैकग्राउंड में उसकी धुन निरंतर न बजती तो शायद लोग हर दूसरे सीन में बाहर दिखते। इन तमाम बातों ने ही फिल्म को एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट से लबरेज रखा है।

सितारे: विद्या बालन, नसीरुद्दीन शाह, इमरान हाशमी, तुषार कपूर, राजेश शर्मा, अंजू महेन्द्रू, इमरान हसनी, शिवानी तंसकाले, मंगल केन्करे
निर्देशक: मिलन लूथरिया
निर्माता: एकता कपूर और शोभा कपूर
बैनर: बालाजी मोशन पिक्चर्स और एल्ट एंटरटेनमेंट
कहानी/संवाद/गीत/पटकथाः रजत अरोड़ा
संगीत: विशाल-शेखर
सिनेमैटोग्राफी: बॉबी सिंह

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