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प्रोडक्ट डिजाइनर आर्टिस्ट नए युग के

हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है प्रोडक्ट या इंडस्ट्रियल डिजाइनिंग। बात आपके टच-स्क्रीन सेलफोन की हो या फिर स्टेनलैस स्टील कॉफी मग की, लॉबी में रखे जाने वाला सजावट का सामान हो या फिर आकर्षक डिजाइन वाली मेज, इन सबमें जो बात मायने रखती है, वह है इनका डिजाइन। ऐसे प्रोफेशनल्स, जो चीजों को उपयोगी और तर्कसंगत बनाने के लिए कला और विज्ञान का इस्तेमाल करते हैं, हमारे संसार को परिभाषित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इंडस्ट्रियल डिजाइनिंग मार्केटिंग को ध्यान में रखते हुए प्रोडक्ट डिजाइन करने से जुड़ी है, जहां कलाबोध पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जानते हैं इन डिजाइनर्स के अनुभव

भिलाई और छत्तीसगढ़ में पढ़ाई करने वाले महेंद्र चौहान ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रायपुर से पांच वर्षीय आर्किटेक्ट प्रशिक्षण हासिल किया। 1977 में ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद उन्होंने एक साल मुंबई आधारित आर्किटेक्चर फर्म में काम किया। चौहान कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि मेरा सबसे मजबूत पक्ष प्रोडक्ट को अच्छी तरह समझना है। एनआईडी में प्रोजेक्ट डिजानिंग कोर्स के दौरान मेरा फाइनल प्रोजेक्ट टीआई साइकिल के साथ साइकिल डिजाइन करना था। बतौर डिजाइनर सबसे पहला काम एकरसता से बचना होता है।’ 2006 में महेंद्र ने टाइटन बेंगलुरू में काम करना शुरू किया। आज वे डिजाइन टीम को लीड कर रहे हैं।

बतौर डिजाइनर एक दिन: कार्यस्थल पर कुछ दिन ग्राहकों से मीटिंग में बीतते हैं तो कुछ दिन नए डिजाइन पर काम करने में। ग्राहकों से मीटिंग करना, विस्तार से बात करना उनकी अपेक्षाओं को समझने में मदद करता है। इसके बाद क्लाइंट की मांग को प्रोडक्ट में ढाला जाता है। टाइटन में डिजाइन पक्ष को भी काफी अहमियत दी जाती है, इसलिए टाइटन के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में डिजाइन टीम की मुख्य भूमिका होती है।

कई प्रेजेंटेशन मीटिंग के बाद ही विचार को इंजीनियरिंग टीम के पास भेजा जाता है। डिजाइन की प्रेरणा हासिल करने के लिए हम यात्राएं भी करते हैं। हाल में भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री के डिजाइन कलेक्शन को समझने के लिए हम जयपुर और राजस्थान भ्रमण पर गए। इसी तरह कांजीवरम तकनीक को समझने के लिए दक्षिण यात्रा की गई। टाइटन की रागा कलेक्शन उसी का परिणाम थी।

स्किल्स: उपभोक्ता के मस्तिष्क को समझना बेहद जरूरी है। अच्छा स्कैच बनाना, विचार पक्ष को मजबूत बनाना, अच्छी कम्युनिकेशन स्किल हर स्तर पर काम आती है। प्रारूप की जानकारी, सरंचना और रंगों की समझ होना भी जरूरी है।

मुझे पसंद है: ऐसे प्रोडक्ट और विचार का निर्माण करना, जो  लंबे समय तक काम करें, अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण काम है। टाइटन ने 15 कलेक्शन पेश की। अब जब लोगों की कलाई पर उन्हें बंधा पाते हैं तो काफी संतुष्टि होती है।

बदलना चाहता हूं: मैं डिजाइनिंग को एक स्ट्रैटेजिक टूल बनाना चाहता हूं। इसे केवल आकार देने वाली इकाई की जगह इसके बिजनेस पक्ष को उभारना चाहता हूं।

डिजाइन एजुकेशन जरूरी है: बिल्कुल जरूरी है। ऐसा करना उम्मीदवार को इंडस्ट्री में उसकी भावी भूमिका के लिए तैयार करता है।

चुनौती: लागत को ध्यान में रखते हुए डिजाइन करना काफी मुश्किल होता है। निर्माण की भी सीमाएं हैं और इसके अलावा डिजाइन और मेन्युफेक्चरिंग इकाइयों का खेल चलता रहता है।

ड्रीम प्रोजेक्ट: मैं समय बताने का एक नया तरीका विकसित करना चाहता हूं। अभी तीन सुइयों वाली घड़ी घंटा, मिनट और सेकेंड व्यवस्था अपनाते हैं। कुछ नया होना चाहिए।

मनी मैटर: शुरुआती वेतन प्रतिवर्ष 5 से 7 लाख रुपये हो सकता है। पांच साल के अनुभव के बाद आप 10 लाख रुपये तक पा सकते हैं।

अभिलाषा नंदल, 23, प्रोडक्ट डिजाइनर, डिजाइनवाइज इंडिया, गुड़गांव
अभिलाषा नंदल को प्रोडक्ट डिजाइन के बारे में राजस्थान स्थित अजमेर में मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल में एक करियर काउंसलर से पता चला था। वे बताती हैं, ‘मैं उस समय इंजीनियरिंग की तैयारी कर रही थी। काउंसलर ने मुझसे पूछा था कि मैं पढ़ाई के अलावा और क्या करना चाहती हूं? मैंने कहा, स्कैचिंग, पेंटिंग और कुछ बनाना। यह सुन कर उन्होंने मुझे सिम्बॉयसिस इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पुणे से अंडरग्रेजुएट कोर्स करने की सलाह दी। वर्ष 2006 के बाद ये चार साल मेरे पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर, मैटल क्राफ्ट आदि क्षेत्रों के अध्ययन में बीते। उस दौरान मुझे समझ आया कि मेरा झुकाव लाइफस्टाइल डिजाइन की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 2010 में पढ़ाई पूरी करने के बाद मुकुल गोयल वर्क में मैंने शुरुआत की। वहां इंटरव्यू हुआ और मुझे इंटर्न के तौर पर चार माह के लिए रख लिया गया। अब एक साल से मैं डिजाइनवाइज इंडिया प्राइवेट लि. में काम कर रही हूं।’

डिजाइनर्स का काम का एक दिन: कुछ दिन नए आइडिया पर सोचने में जाते हैं तो कुछ मीटिंग और ब्रेनस्टॉर्मिग सेशन में बीतते हैं। मैं प्रशासकीय कार्यों में योगदान देती हूं। पर दिनभर के काम का सबसे अच्छा हिस्सा वह होता है, जब मैं प्रोडक्शन विभाग में होती हूं, सैंपल बनाती हूं और विचारों को प्रोडक्ट बनते देखती हूं।

स्किल्स: मैटीरियल और तकनीक की जानकारी होना और कुछ नया और प्रभावी बनाने की क्षमता होना। पर जानकारी परंपरागत डिजाइन की होना भी जरूरी है। उम्मीदवार में जिज्ञासा और उत्साह होना जरूरी है। यदि आप कुछ भी नहीं जानते तो भी आपको सीखने का बेहतरीन मौका मिल जाता है।

नौकरी में क्या पसंद है: मुझे प्रोडक्शन विभाग में काम करना अच्छा लगता है, जहां आप सोचते हैं, अपने विचार से खेलते हैं और कुछ नया क्रिएट करते हैं।

डिजाइन एजुकेशन जरूरी है: हां, मैटीरियल की आधारभूत जानकारी होना बेहद जरूरी है। पर यह भी सच है कि मैंने पिछले एक साल में पढ़ाई के चार सालों से अधिक सीखा है।

चुनौती: आपको यह याद रखना पड़ता है कि आप अपने लिए डिजाइन नहीं कर रहे हैं। आप यह काम अपने क्लाइंट यानी खरीदार के लिए करते हैं। साथ ही इस क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए जरूरी है कि आप कुछ खास, नया और आकर्षक पेश करें।

ड्रीम प्रोजेक्ट: मैं ऐसे लाइफस्टाइल प्रोडक्ट बनाना चाहती हूं, जो खास जरूरतों को पूरा करने वाले हों।

मनी मैटर: छोटे स्टूडियों मल्टीनेशनल फर्मों की तुलना में कम पैसा देते हैं, पर फ्रेशर्स के लिए इन छोटे स्टूडियो में सीखने के अनेक मौके होते हैं। शुरुआती भत्ता 4 से 10 हजार रुपये तक हो सकता है। शुरुआती वेतन 15 से 35 हजार रु तक होता है।

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