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विकलांगता : हमारी सोच पर हावी ‘सक्षमवाद’

विश्व विकलांग दिवस को देश भर के ‘विकलांग’ अपनी मांगों को बुलन्द करेंगे। ग्यारहवीं पंचवर्षी योजना में विकलांगों के साथ किए गए वायदों को पूरा करन की मांग उठान के साथ-साथ विकलांग मामलों के लिए अलग मंत्रलय की भी मांग वह रखेंगे। विकलांगों के हकों के लिए कार्यरत समूह चाहते हैं कि हर मंत्रालय अपने संसाधनों का कमस कम तीन फीसदी विकलांग मामलों के लिए दे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की बात को सही मानें तो पूरी दुनिया में लगभग साठ करोड़ लोग किसी न किसी किस्म की विकलांगता से पीड़ित हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ का आकलन है कि यह संख्या 65 करोड़ है, जिनके लिए किसी न किसी किस्म के विशिष्ट अवसरों की आवश्यकता है, ताकि वह शेष समाज के साथ आगे बढ़ें। वैसे एक तरफ जहां व्यापक समाज में विकलांगता के मसल को लेकर संवेदनशीलता की बढ़ोत्तरी के समाचार मिलते हैं, वहीं हम यह भी पाते हैं कि कार्पोरेट जगत के कर्णधार इस मामले में स्मृतिलोप का शिकार हैं। यह अकारण नहीं था कि कुछ वक्त पहले उद्योग परिसंघ के एक सम्मेलन में खुद पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम को उद्योग जगत के इन कप्तानों को यह अपील करनी पड़ी कि वे अपने ‘मानवीय पक्ष को उजागर करें’ और ‘अलग ढंग से सक्षम लोगों को नौकरी दें।’ ऐसी अपील करन की फौरी वजह थी सरकार के सामने उजागर हुई यह हकीकत कि बजट में विकलांगों के कल्याण के लिए किए गए आवंटित की गई राशि का छह माह बाद भी अछूता रह जाना। चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में पेश बजट में वित्तमंत्री ने विकलांगों की सहायता के मद में 1,800 करोड़ रूपए की राशि रखी थी। इसके अन्तर्गत विकलांगों को नौकरी पर रखे जाने की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा और कर्मचारियों की दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि इस बजट से हासिल की जा सकती है। सरकार का यह भी आकलन था कि इसके माध्यम से एक लाख लोगों तक आसानी से पहुंचा जा सकेगा। बाद में सफाई के अन्दाज़ में यह कहा कि उन लोगों को इस योजना का पता ही नहीं था। यह भी मुमकिन है कि सरकारी अधिकारियों ने इसका विधिवत प्रचार नहीं किया हो, लकिन क्या यह स्पष्टीकरण समूच कार्पोरेट जगत के लिए लागू हो सकता है? दिक्कत यह है कि निजी क्षेत्रों में विकलांगों के रोजगार अवसर नाममात्र ही हैं। जहां बड़ी निजी फर्मों में यह आंकड़ा 0़3 फीसदी दिखता है तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में महज 0़05 फीसदी तक ही पहुंचता है। (विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘पीपुल विथ डिसएबिलिटीज इन इण्डिया : फ्रॉम कमिटमेण्ट्स टू आउटकम्स’ में प्रदत्त आंकड़ें)। अभी तक विकलांगता को ‘चिकित्सकीय मॉडल’ के सन्दर्भ में ही अधिकतर देखा-समझा जाता रहा है। यह सोच विकलांगता को शारीरिक मानसिक क्षति के समकक्ष रख देती है। लकिन बदलते समय में उसके ‘सामाजिक मॉडल’ पर जोर दिया जाना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसके लिए जिस कन्वेन्शन का आगाज़ किया है, उसके पीछे मूल चिन्ता यही है कि विकलांगों के लिए समाज कल्याण और चैरिटी के रास्ते को अपनाने के बजाए हमें विकलांगों अधिकार और आजादी की सोच अपनानी चाहिए। विकलांगों के लिए मुकर्र कल्याण राशि के अछूते रह जान के पीछे कहीं हमार मानसिकता पर भी हावी ‘सक्षमवाद या एबलिज़्म’ तो नहीं है? ‘नस्लवाद’ और ‘यौनवाद’ की तरह भले ही यह शब्द हमारे भाषाई विमर्श में उतना प्रचलित न हो, लकिन यह उस समझदारी को बयां करता है जहां ‘सामान्य जीवन’ का पैमाना उन लोगों से तय होता है, जो विकलांग नहीं हैं। इसी वजह से विकलांग लोग अपनी शारीरिक या बौकि क्षमताओं की भिन्नता के कारण मुख्यधारा में अपमान का शिकार होते हैं। सक्षमवाद का अर्थ है, ऐसे सामाजिक सम्बन्ध, व्यवहार और विचार, जो इस धारणा पर आधारित होते हैं कि सभी लोग सक्षम शरीरों वाले होते हैं। सक्षमवादी समाज बहिष्कार पर जोर देता है, जबकि एक समावेशी समाज सब लोगों को साथ ले चलन का आग्रह करता है। अस्सी के दशक तक विकलांगता सम्बन्धी विमर्श में ‘समाजकल्याण’ कदमों को उठाने पर जोर था और इसे ‘मानवाधिकार का मुद्दा’ बनाने से दुनिया बहुत दूर खड़ी थी। विकलांगता के प्रश्न पर 1में प्रकाशित अपनी चर्चित किताब ‘हैंडिकैपिंग अमेरिका’ में विकलांगों के अधिकारों के लिए संघर्षरत फ्रैंक बोवे लिखते हैं कि असली मुद्दा विकलांगता के प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया का है। अगर कोई समुदाय भौतिक, स्थापत्यशास्त्रीय, यातायात सम्बंधी तथा अन्य बाधाओं को बनाये रखता है तो वह समाज उन कठिनाइयों का निर्माण कर रहा है जो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ित को उत्पीड़ित करते हैं। दूसरी तरफ, अगर कोई समुदाय इन बाधाओं को हटाता है, तो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ित अधिक उंचे स्तर पर काम कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में ‘विकलांगता’ सामाजिक तौर पर निर्मित होती है। लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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