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उन्होंने खुद को कुर्बान कर दिया..

उन्होंने खुद को कुर्बान कर दिया..अपनी जिंदगी वतन के नाम कर दी। हमें, हमारे स्वत्व, हमार धरोहर, हमार गौरव को नष्ट करने के दुश्मनों के नापाक मंसूबे आखिरकार ध्वस्त हुए। बेशक इसकी हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। आतंकियों के कायराना हमलों में निर्दोषों-निहत्थों का खून बहा। चुनौती थी कि हमार घर, हमारे ही आशियाने में घुसकर दीवारों की ओट से मासूमों, महिलाओं, मेहमानों पर गोलियां बरसा रहे दहशतगर्दो को मुंहतोड़ जवाब दिया जाये। एसे मुश्किल वक्त में अपनी जान, बीवी-बच्चों, मां-बाप और अपने परिवार की परवाह किये बगैर आगे आये हमार जवान। हमारी धरती के वो सच्चे सपूत, जिन्होंने पहले भी संकट की घड़ियों में अपनी बेमिसाल जाबांजी, अपने अप्रतिम शौर्य और शहादत की कई पटकथाएं लिखी हैं। आतंक के खिलाफ इस जंग में शहीद हुए हेमंत करकर होवीर सपूतों को शत-शत नमन!ं, विजय सालस्कर हों, संदीप उन्नीकृष्णन हों, अशोक कामटे हों, गजेंद्र सिंह हों या फिर बहादुरी से लड़ते हुए घायल राजवीर सिंह या कोई और कमांडो, इन्हीं वीरों-शहीदों-सपूतों की बदौलत हमें अमन और सुकून के पल नसीब हुए हैं। इन्हीं की कुर्बानी के बूते हमार भीतर दुश्मनों से, आतंक से लड़ने का जज्बा पैदा हुआ है। तो आइये इन सपूतों का हम भी नमन करें। रांची के सपूत मलयेश बनर्जी और बगोदर के प्रकाश मंडल जसे जिन सैकड़ों निर्दोषों का खून बहा है, उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करं। हिन्दुस्तान ने एक छोटी सी पहल की है। हम चाहे किसी भी वर्ग, किसी भी धर्म या मजहब के हों-मंगलवार की शाम पांच से छह बजे के बीच जुटेंगे रांची के सैनिक मार्केट में। श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने, उनकी कुर्बानी की याद में एक दीप जलाने। इस कामना के साथ कि.. मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जायें वीर अनेक। ं

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