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बेखबर खुफिया तंत्र

आतंकवादी हमले के शिकार मुंबई के होटल ताज महल की आग ठंडी पड़ते ही देश के भीतर बहुत कुछ सुलगने लगा है। पिछले कुछ महीनों के दस्तावेजों, खुफिया निर्देशों, विभागीय चेतावनियों सबकी पर्ते उधेड़ी जा रही हैं। हर कोई अपनी तरफ से यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि चूक उसकी तरफ से नहीं हुई, उसने तो पहले ही चेतावनी दे दी थी, बाकी सबने ध्यान नहीं रखा तो उसकी क्या गलती। हादसे के बाद इस तरह के दावे, पोस्ट-मार्टम एजेंसियों के लिए खाल बचाने की कोशिश ही होती है, और बाकी देश के लिए इसका कोई खास अर्थ नहीं होता। खुफिया सूचनाओं से जो टुकड़ा-टुकड़ा सच सामने आए हैं, उन्हें जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर यही उभरती है कि हमारी एजेंसियों ने आतंकवादियों के इरादों के सुराग भले ही पा लिए हों, लेकिन इन सूचनाओं को किसी अंजाम तक पहुंचाने की इच्छाशक्ित कहीं नहीं है। न इन एजेंसियों में और न ही उनके आकाओं में। मुंबई में हुई वारदात दो ही चीजें दिखाती है। एक, इस वारदात को अंजाम देने वालों में कराची से जलालाबाद और बांग्लादेश से मुंबई तक के अपने संगठनों से बड़ा अच्छा तथा सटीक तालमेल था। दो, ऐसी वारदात को रोकने के लिए हमने अपने देश में जो भारी भरकम तंत्र खड़े किए हैं, वे आपस में कोई तालमेल नहीं बना पाए हैं। आतंकवादी एक के बाद एक लगातार सफल हो रहे हैं और हमारा सुरक्षातंत्र लगतार असफल। यह असफलता सिर्फ खुफिया तंत्र की ही नहीं है। कहीं पर यह उन कोशिशों की भी नाकामयाबी है, जिनके बल पर हम अपने देश को एक विकसित राष्ट्र, एक विश्वशक्ित बनाने का सपना देख रहे थे। लचर खुफिया तंत्र और आधी-अधूरी सुरक्षा व्यवस्था हमार बुलंद शाईनिंग सपनों और इरादों से कहीं भी मेल नहीं खाती। यह कैसे हो सकता है कि एक छोटे से असफल देश से आए कुछ आतंकवादी हमार यहां कभी भी, कहीं भी, बमों के धमाके कर लें, लोगों को बंधक बना लें, इमारतों को तबाह कर दें और इसके बावजूद हम एक विश्व शक्ित बन जाएं। पिछले कुछ समय में हमने तरक्की को रफ्तार देने के लिए बहुत कुछ किया है। लेकिन बहुत कुछ छूट गया है। खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों को नए दौर के हिसाब से आधुनिक और ज्यादा पेशेवर बनाना भी उनमें से एक है। कुछ चुनींदा चीजों को पकड़ कर ही हम आगे नहीं बढ़ सकते।

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