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तख्त को ललकार है ‘ताज’ पर हमला

हाल के वर्षो में हमारे देश ने इतने सारे आतंकवादी हमले झेले हैं कि कुछ लोगों को लगने लगा था कि हम दहशतगर्दी के आदी होते जा रहे हैं। मासूमों की जान लेने वाले बम धमाके हो या जमीनी सुरंगे। हताहत परिवार भले ही जीवनर्पयत सामान्य नहीं हो सकते- श्रोता, दर्शक और पाठक आदि सुर्खियों के धुंधलाते ही अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में व्यस्त हो जाते हैं और जानलेवा चुनौती जस की तस बरकरार रहती है। इसी का नतीजा है कि मुंबई जैसी घटनाओं को अंजाम देने में भारत के शत्रु कभी भी ज्यादा परेशानी नहीं महसूस करते। इस बार का हमला पिछली सभी वारदातों से फर्क और कहीं ज्यादा संगीन है। सिर्फ इसलिए नहीं कि इस बार आतंकवादियों की और सुरक्षाकर्मियों की मुठभेड़ लगभग 60 घंटा चली और हमलावरों के तेवर बंधक बनाने वाले फिदाईन जेहादियों के कम, पेशेवर प्रशिक्षित सैनिक कमांडों वाले ज्यादा थे। लगता है इस बार हमलावर यह दिखलाना चाहते थे कि वह जब चाहे, जिसे चाहे अपना निशाना बना सकते हैं। जाहिर है कि खुद खतरे में घिरने, चोट खाने और जान गंवान के बाद अखबारों के तीसरे पन्ने में रंगीन जिन्दगी बसर करने वाले इस वक्त बेहद बौखलाए नजर आ रहे हैं। टेलिविजन स्टूडियों की प्रायोजित बहसों में कागजी शेरों की तरह दहाड़ रहे हैं। सभी चेहरे बासी और चिर-परीचित है। शोभा डे, सुहेल सेठ, अलीक पद्मसी वगैरह। इनमें से हरेक विरासती इमारत (हैरीटेज लैंडमार्क) को नुकसान पहुंचने से बेहद व्यथित हैं और मौका-ए-वारदात से राष्ट्र को संबोधित करते हर नौसिखिए या वरिष्ठ संवाददाता का यह विलाप सुनन को मिला है कि ‘हाय कितना खूबसूरत रेस्त्रां था, कितना नायाब खाना परोसा जाता था। हमने अपनी जिन्दगी के कितने खूबसूरत लम्हें ताज की छत के नीचे बिताये हैं! पलक झपकते सब कुछ तबाह हो गया’ आदि। इस बात को नजरंदाज करना कठिन है कि अगर घुसपैठिए आतंकवादियों को पांचतारा-साततारा छाप होटलों में मेहमान बनकर अपने रणक्षेत्र की खोज-बीन पैमाइश करन की सहूलियत न होती तो इस साजिश को इतना खूंखार और नुक्सानदेह अंजाम देना सहज न होता। जो लोग इस वक्त यह रोना-पीटना कर रहे हैं कि आखिर हमारी तटरक्षक कोस्ट गार्ड क्या कर रही थी या केन्द्रीय गुप्तचर सेवा से प्राप्त चेतावनी के बावजूद महाराष्ट्र पुलिस क्यों हाथ पर हाथ थरे बैठी थी और क्यों अरब सागर में समुद्री लुटेरों को ललकारने वाली भारतीय नौसेना इन दहशतगर्दो की रबड़ की डोंगियों पर नजर नहीं रख सकी थी। उन्हें यह याद दिलान की जरूरत है कि जितनी देर तक यह रक्तरंजित संघर्ष चला उसे देखते यह कहना तर्कसंगत नहीं कि हमलावर एक-दो डोंगियों में पहुंचने वाले दसेक भर ही थे। आज भले ही जांच-पूरी होन के बहुत पहले ही बड़े-बड़े होटलों के प्रबंधक-स्वामी अपने तमाम कर्मचारियों को बेगुनाह होन का प्रमाणपत्र दे चुके हैं, यह शक बेबुनियाद नहीं कि बिना किसी विभीषण या जयचंद की सहायता के इन होटलों में पूरी तरह कब्जा कर लेना हत्या और आगजनी का तांडव कर सकना किसी दो-चार रोज के मेहमान के लिए संभव नहीं। इन होटलों में ठहरने वाले अधिकतर अमीर विदेशी पर्यटक होते हैं या ऐसे भारतीय जो समाज के सबसे ऊपरी तबके की सबसे मलाईदार परत के सदस्य होते हैं। इनमें दूसरे के खर्च पर मौज-मस्ती करने वाले आला सरकारी अफसर भी होते हैं और बड़े राजनेता भी। हमें इनकी भोग-विलास की जिन्दगी से कोई ईष्र्या नहीं। बहरहाल, जिस बात की ओर हम अपने पाठकों का ध्यान दिलाना चाहते हैं, वह यह है कि अपने देशी-विदेशी मेहमानों-ग्राहकों की जामा तलाशी लेने या उनमें से किसी को भी शक की निगाह से टटोलन का जोखिम कोई भी होटल नहीं उठा सकता। ऐसा हुआ तो धंधा चौपट होते देर नहीं लगेगी। यहां यह बात जोर देकर दोहरान की जरूरत है कि यह बात सिर्फ मुंबई के ताजमहल होटल या ओबरॉय ट्राइडेंट की नहीं। विश्वस्तरीय विरासती इमारत और पर्यटकों में लोकप्रिय रैनबसेरों पर लागू होती है। देश की राजधानी के पहाड़गंज इलाके के सरायनुमा होटलों में रहने वालों को शक की निगाह से देखना, उनकी धर-पकड़ या उनसे पूछताछ या उनके मालिकों पर दबिश डालना पुलिस कर्मियों और खुफिया एजेंसियों के लिए आसान हो सकता है। ताज और उस जैसे दूसरे होटलों की कोई तुलना इनसे नहीं की जा सकती। ताज एक बहुत बड़ा होटल है और ओबरॉय-ट्राइडेंट इससे कुछ ही छोटा। इनमें घिरे-फंसे मासूमों की संख्या सैकड़ों का आंकड़ा पार कर चुकी थी। हमलावरों ने जिस तरह अंधाधुंध गोलियां बरसाई, उस बौछार में मरने वाली सभी बेशुमार अमीर नहीं थे। किचनकर्मियों ने भी अपनी जान गंवाई और निरीह वेटरों ने भी। यह बात समझ में आने वाली है कि टेलिविजन कैमरों और अखबारों का या इन्हीं दो ठिकानों पर बना रहा। जा कुछ जगह और मोहलत बची उसे नारीमन भवन ने घेर लिया, जहां विदेशी यहूदियों का एक परिवार फंसा था। हमें जाने क्यों यह बात अटपटी लग रही है कि इस पूर कवरेज में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल कहीं पीछे छूट गया, जहां आतंकवादियों न कई ऐसे परिवार शोकसंतप्त छोड़े, जिनका कोई सदस्य न तो मशहूर हस्ती था और जिन्हें न सही विपन्न और वंचित पर आम हिन्दुस्तानी का प्रतिनिधि समझा जा सकता है। कुछ इसी तरह वह टैक्सी चालक और उसमें सवार भी भुला दिए गिए, जिनके परखचे आतंकवादियों ने उड़ा दिए थे। जरा कल्पना करें कि अगर कहीं आगरे का ताजमहल आतंकवादियों के निशाने पर होता, तब उसकी रक्षा कितनी दुष्कर होती। असली बात समझने लायक यह है कि जो ताज संकटग्रस्त है, वह भारत की संप्रभुता का है। चुनौती सिर्फ बंधकों में से अधिकांश को बचा लेन की या एक भव्य इमारत को ध्वस्त होने से बचा लेन की नहीं, बल्कि भारत सरकार के डावांडोल तख्त को स्थिर करन की है। इसे घोर दुर्भाग्य का विषय ही समझा जाना चाहिए कि अकर्मण्य और लाचार गृहमंत्री की जिम्मेदारी और जवाबदेही के सवाल उठान के पहले किसी और बात को तरजीह दी जाए। इस देश का मुकुट कहलाने वाला कश्मीर वर्षो से आतंकवादियों की चपेट में है और जहां तक किसी विरासत का प्रश्न है क्या भारतीय संसद भवन से अधिक मूल्यवान कोई धरोहर इस जनतांत्रिक गणराज्य में हो सकती है? वक्त आ गया है कि आतंकवादियों ने जिस असली ताज और तख्त को जोखिम में डाला है, उसके प्रति हम सतर्क हों और अपनी जिम्मेदारी समझें। जवाबदेही और जिम्मेदारी का सवाल आज मुंह बाए खड़ा है। लेखक जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।ं

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