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राजरंग

दो नाव पर पांव नेताजी इन दिनों बड़े परशान हैं। दल-बदलने का आरोप जो चस्पां है। जिस दल से जीत कर आये थे, उसी के लिए गड्ढा खोदने लगे। असल में है क्या कि उनके सखा ने दल को गुड बाई क्या कर दिया, उनका दिल भी दल से टूट गया। लेकिन कहते हैं न कि शरीर तो दल में रहा, आत्मा सखा के साथ घूमने लगी। दलवालों को यह नागवार लगा। शरीर यहां और प्राण कहीं और? यह बहुत बेइंसाफी है। सबक सिखाने के लिए निलंबित कर दिये गये। इसके बाद भी नहीं सुधर। दिल का जो मामला ठहरा। खुलकर लालबाबू के साथ घूमने लगे। जब मौका मिला, अपनी ही पार्टी के नेताओं को आंख दिखाने लगे। पानी सिर के ऊपर से बहने लगा तो दल-बदल का मामला लदा गया। जब फंस गये, तो लगे सफाई देने। मान्यवर, आप सफाई भी देंगे तो भी जनता को सब पता है। कौन किसके साथ है। कौन कितने पानी में है। पब्लिक को सब पता है, मालूम। लोकतंत्र में हर किसी को बोलने की छूट है। लेकिन झूठ बोलकर सच को नहीं झुठलाया जा सकता है। सच तो भाई सच होता है। इसको झूठ के परदे से नहीं ढका जा सकता। कहावत है ना भइया- दो नाव पर पैर रखने का नतीजा बड़ा खराब होता है। कहीं ऐसा न हो कि नेताजी भंवर में फंस जायें। कोई गल नहीं, डोंट वरी। कै

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