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वासना अंधी होती है: स्वामी सत्यानंद सरस्वती

वामी सत्यानंद ने कहा है कि वासना अंधी होती है। इसको नियंत्रित करने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है। गुरू में जितनी श्रद्धा होगी, उतना ही तुम्हारी में वासनाओं का सही दिशा में रूपांतरण होगा। वह मंगलवार को शतचंडी महायज्ञ के समापन पर देश-विदेश के कोने से आये भक्तों को संबोधित कर रहे थे। देवी को जानवरों एवं कद्दू की बलि देने भारतीय प्रथा पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि यदि देवी को बलि देकर खुश करना है तो अपने अहंकार की बलि दो, मनुष्य के अंदर जो पाश्विकता छिपी है, उसी की बलि दो। तुम्हार अंदर जितना तनाव, वासना, लोभ, क्रोध, ईष्र्या है, उसे भगवती के चरणों में समर्पित कर दो। विवाह पंचमी के अवसर पर लड़की के जीवन में शादि के महत्व को प्रतिपादित करते हुए उन्होंने कहा कि भलें ही कलेक्टर, कमिश्नर, डॉक्टर व गर्वनर बन जायें, यदि शादी नहीं होती है, तो जीवन की शुरूआत नहीं होती है।ड्ढr लड़कियां ब्रेक थ्रो के लिए क्या-क्या नही ंकरती हैं। शादी होना यानि बेड़ा होना। उन्होंने कहा कि बिना आध्यात्मिक शक्ित के समाज में कोई भी विकास और सुधार का काम बेकार साबित होगा।ड्ढr वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शतचंडी महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद विदेशों से आये, उनके भक्तजन हवन कुंड की प्रक्रिया की और माथा ठेके। आश्रम का वातावरण उस समय रोचक हो उठा, जब मुख्य मंच पर स्वामी सत्यानंद शिव व लीला का विवाह संपन्न करा रहे थे, वहीं दूसर मंच पर शंख की ध्वनि के साथ स्वामी निरांनानंद सरस्वती राम सीता का परंपरागत विवाह करा रहे थे। फिर मिलेंगे कहकर स्वामी सत्यानंद भक्तों से विदा हुए।

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