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हांफिए . खांसिए और धूल फांकते चलिए

हांफिए, खांसिए और धूल फांकते चलिए। यह राजधानी में विकास की कहानी है। विकास पर्यावरण को निगलने पर उतारू है। हवा में धूलकणों के बादल तैरते हैं। इस माहौल से होकर प्रति दिन लाखों लोग गुजरते हैं। पर्यावरण के जानकार भी मानते हैं शहर की हवा में रासायनिक गैसों की तुलना में धूलकणों की संख्या इतनी अधिक है जो कई प्रकार की बीमारियों को जन्म दे रही है। राजधानी के कई इलाकों की फिलहाल यह पहचान बन गयी है। पर्यावरण के हिसाब से सड़क और पुल निर्माण के पूर्व पर्यावरण को लेकर राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लिया जाता है। राजधानी में कछुए की गति से बननेवाली सड़कों का खामियाजा जनता भुगत रही है। सड़क से उड़नेवाली धूल की मोटी चादर में आदमी को कौन कहे ट्रक, ट्रैक्टर और ओटो भी लिपट जाते हैं।ड्ढr ड्ढr विश्वास न हो तो शहर में कंकड़बाग कॉलोनी, दीघा क्षेत्र और बल्लमीचक से फुलवारीशरीफ टमटम पड़ाव तक की यात्रा करके देख लें। इतनी दूर में कोई सांस लेना गवारा नहीं करता। निर्माण कंपनियों को इसे लेकर कोई परवाह नहीं। सड़क पर पानी का छिड़काव न होने से हवा में धूलकण की मात्रा शाम में तीन-चार हजार माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ऊपर चली जाती है। पर्यावरण के लिहाज से हवा में 200 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर धूलकण को ही आदर्श स्थिति मानी जाती है। हवा में 200 की जगह धूलकण की मात्रा 3-4 हजार माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इन क्षेत्र में सड़क और नाला निर्माण कार्य करानेवाली कंपनियां पानी का छिड़काव कराने की जहमत भी नहीं उठाती। उधर उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद भी खुली ट्रालियों पर बालू की ढुलाई जारी है। शाम में स्थिति तो और बुरी हो जाती है। पानी के छिड़काव से इसपर बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एस.एन.राव ने कहा कि इस क्षेत्र में निलम्बित धूलकणों का आकलन नहीं किया गया है। संबंधित कंपनियों को इस पर नियंत्रण के लिए निर्देश जारी किया जाएगा।

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