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चिदंबरम ही सबसे उपयुक्त थे

ेंद्र सरकार ने देश की वित्तीय राजधानी पर हुए हमले का जवाब वित्तमंत्री को गृहमंत्री की कुर्सी सौंपकर दिया है। लेकिन पहली नजर में क्या यह एक बौखलाए सम्राट की अटपटी कार्यवाही जसा नहीं लगता? क्या इसकी तुलना एक राजकोषाध्यक्ष को सेनापति बनाए जाने से की जाए? कहीं यह मुनीमजी को महल की सुरक्षा का जिम्मा सौंपने जसा तो नहीं? चूंकि मुंबई हमले के बाद, चिदंबरम के गृह मंत्रालय में आने से कहीं ज्यादा अर्थवान (और वांछित) चीज शिवराज पाटील का जाना लग रही है, सूत्रधार परिवर्तन से जुड़े ऐसे सवालों पर बहुत लोगों का ध्यान नहीं जाएगा। लेकिन जो लोग आधुनिक आतंकवाद के विराट वित्तीय पक्ष से परिचित हैं, और जो लोग मानते हैं कि भारत की आतंक विरोधी मुहिम ने अभी तक आतंकवादियों के वित्तीय नेटवर्क को नजरंदाज किया है, उन्हें इन सवालों पर तरस आएगा। क्योंकि कई तथ्य ऐसे हैं जो चिदम्बरम को यह जिम्मेदारी देने के फैसले को खासा कारगर और व्यावहारिक साबित कर सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है कि चिदम्बरम के बस्ते में कम से कम एक हाार उन संदिग्ध सौदों का वित्तीय ब्यौरा मौजूद है, जो आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े माने जा रहे हैं। बतौर वित्तमंत्री, वे 2004 से उस फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट का संचालन कर रहे हैं, जो आतंकवाद की फाइनेंसिंग और मनी लांड्रिंग से जुड़े लेन-देन पर नजर रखता है। इस यूनिट ने तकरीबन एक हाार संदिग्ध सौदों का ब्यौरा रॉ, आईबी, आरबीआई, सेबी और सीबीडीटी को भेजा है। चिदंबरम ने ही बैंकों के नकद लेनदेन पर कैश ट्रांजेक्शन टैक्स लगाने की शुरुआत की थी जिसका मकसद टैक्स उगाही से ज्यादा सौदों का ट्रैकिंग रिकार्ड एकत्र करना था। शोधकर्ता कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को विचारधारा और पैसा (आइडियोलॉजी एंड मनी) - ये दो चीजें ही परिभाषित करती हैं। ऐसा है तो अच्छा है कि दहशतगर्दी पर लगाम कसने का जिम्मा अब ऐसे आदमी को मिला है जो इन दोनों चीजों को अच्छी तरह समझता है। अगर वाकई मुंबई हमले के बाद भारत की आतंक निरोधक रणनीति में कोई युगांतकारी मोड़ आना है तो उसका मुख्य अवयव बेहतर खुफिया निगरानी के साथ-साथ आतंक के फाइनेंसिंग ढांचे को धराशायी करना भी होगा। याद रहे व्हाइट हाउस ने 11 सितंबर 2001 के हमले के ठीक 13 दिन बाद, 24 सितंबर को 27 ऐसे व्यक्ितयों और संस्थानों की लिस्ट जारी की थी जिनके अलकायदा और दूसर आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने के सबूत मिले थे और जिनके बैंक खातों और संपत्तियों को तत्काल प्रभाव से सील कर दिया गया था। अलकायदा मूलत: एक चंदा उगाहने वाला संगठन है और उसके आतंकवादी दर्शन में बिजनेस भी आइडियोलॉजी जितना ही अहम है। जगजाहिर है कि दहशतखोरी के लकड़बग्घे सउदी अरब और दूसर खाड़ी देशों के पेट्रो डॉलर वाले खराती चरागाहों में ही चरते हैं। इसीलिए नाइन इलेवन के एक पखवाड़े के भीतर अमेरिका ने ऐलान कर दिया कि आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए वे सबसे पहले उसकी वित्तीय प्राणवायु के रास्ते बंद करंगे। एक सेकंड में करोड़ों गणनाएं करने में सक्षम आधुनिक सूचना तकनीक का सटीक प्रयोग करते हुए उसने वास्तव में हवाला सौदों और गुप्त बैंक खातों की निगरानी का एक विश्वव्यापी नेटवर्क विकसित कर लिया। यह आतंकवाद के प्रति एक सुपरपावर का सुपरकंप्यूटरी जवाब था। कोई वजह नहीं कि ग्लोब पर नॉलेज सुपरपावर के रूप में नई पहचान बना चुका भारत आतंकवादियों की वित्तीय गतिविधियों की पड़ताल का कोई सुपरसॉफ्टवेयर न विकसित कर सके। एके 47 के साथ चलने वाले कायर चूहे जिन खजानों के बूते उछलते हैं, उन्हें नेस्तनाबूद करने की पंचतंत्री जुगत की आज भारत को भी सख्त जरूरत है। सिर्फ इसलिए नहीं कि अमेरिका की तरह भारत भी राज्य-प्रायोजित (स्टेट स्पांसर्ड) आतंकवाद का शिकार रहा है और इस्लामाबाद की अंदरूनी सियासी मजबूरियां पाक को आतंकवाद की आग में करोड़ों-अरबों रुपये झोंकने को प्रेरित करती हैं। इसलिए भी कि नकली करंसी की प्रिटिंग आतंकवादी मशीनरी की खुराक बनकर उभरी है। और इसलिए भी कि मुंबई के छब्बीस इलेवन कांड की जांच बताती है कि मराीवड़े हमलावरों को एक कुख्यात बिजनेसमैन समेत आधा दर्जन से ज्यादा स्थानीय लोगों की मदद मिली थी और उन्होंने किस्म-किस्म के क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किए। विश्व भर में नशीली दवाओं की तस्करी का लगभग दो खरब डालर का सालाना कारोबार आतंकवादियों का सबसे वफादार दोस्त है। भारतीय विमान को अगवा कर कंधार ले जाने वाले आतंकवादियों ने रिहाई के बदले सिर्फ अजहर मसूद जसे कैदी ही नहीं मांगे थे, उन्होंने करोड़ों की फिरौती के लिए भी लंबा मोलभाव किया था और आज तक विशेषज्ञ यकीन से नहीं कह सकते कि मसूद को कंधार छोड़कर आने वाले भारतीय हुक्मरानों ने पैसे का भुगतान नहीं किया था। आतंकवाद के इन तमाम वित्तीय पहलुओं को समझने के लिए गृहमंत्रालय और वित्तमंत्रालय की एक परफेक्ट जुगलबंदी चाहिए। चिदंबरम में मूर्तिमान गृहमंत्री को यह समझदारी विरासत में मिल रही है। यूं गृहमंत्रालय भी चिदंबरम के लिए नया नहीं। राजीव गांधी सरकार में 1से लेकर 1े दौरान वे गृह राज्यमंत्री रह चुके हैं और तब उन्होंने एनएसजी को पालने-पोसने में यादगार भूमिका निभाई थी। उसी दौरान मई 1में अकाल तख्त से उग्रवादियों को खदेड़ने वाला कामयाब ब्लैक थंडर ऑपरशन भी हुआ था। इसमें शक नहीं कि पाटील की गद्दी चिदंबरम को सौंपने का फैसला मुंबई हमले से उपजी चहुंमुखी धिक्कार, शर्म और हताशा के माहौल में हुआ। मुमकिन है इस फैसले की तात्कालिक वजह गृहमंत्री की कुर्सी के स्वाभाविक दावेदारों- विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी और रक्षामंत्री एंटोनी- की अति व्यस्तता हो। एक दूसरी व्याख्या के मुताबिक आर्थिक मंदी के प्रबंधन से नाखुश प्रधानमंत्री कुछ समय से पाटील ही नहीं, चिदंबरम का भी महकमा बदलना चाहते थे और इस मौके पर उन्होंने दोनों मंसूबे पूर कर लिए। लेकिन नकारात्मक व्याख्याओं के बीच कुछ अवकाश सकारात्मक व्याख्याओं को भी मिलना चाहिए। चिदंबरम को यह जिम्मेदारी इसलिए भी दी गई होगी कि वह प्रोफेशनल अप्रोच वाले एक सादगीपसंद और अनुशासनप्रिय राजनेता हैं। वित्तीय सुधारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता संदेह से पर रही है। गृहमंत्रालय भी वर्षो से अटके पड़े कई सुधारों के लिए छटपटा रहा है। तट सुरक्षा की संयुक्त कमांड का गठन, अटके पड़े पुलिस रिफार्म को लागू करना, एनएसजी का विकेंद्रीकरण, वीआईपी सुरक्षा में फंसी फोर्स की सही जगह तैनाती, खाली पड़े हाारों पदों को भरना, आपदा प्रबंधन का पुनर्गठन, खुफिया इनपुट पर तुरंत अमल करने वाले तंत्र का विकास और सुरक्षाकर्मियों के हथियारों का आधुनिकीकरण- ऐसे दर्जनों काम बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे हैं। सिस्टम में सुधार का उनका लंबा तजुर्बा यहां काम आएगा। लेखक हिन्दुस्तान, दिल्ली संस्करण के उप स्थानीय संपादक हैं

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