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समवेत कार्रवाई की जरूरत

मुंबई का संत्रास हमें लंबे समय तक पीड़ित करता रहेगा। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली रहा कि हमला शुरू होने के महा आठ घंटे पहले दिल्ली लौट आया था। वैसे मैं ताज महल होटल के उसी धरोहर वाले हिस्से में ठहरा हुआ था जिसे जबर्दस्त नुकसान हुआ है। मुंबई में मेरा आखिरी डिनर ओबेराय होटल के उसी टिफिन रस्तरां में था जहां अगली शाम सबसे वीभत्स और क्रूर हत्याओं ने कई जीवन छीन लिए। मुंबई की इस भीषण घटना के कई सबक और कई परिणाम हैं। सबसे पहले इसने यह बता दिया है कि हम कितने असुरक्षित हैं। महा दस दुर्दात आतंकियों के दल ने जनसंहार और मनमाना विध्वंस किया। सामान्य स्थिति बहाल करने में सरकार की समवेत शक्ित यानी सेना, नौसेना, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड(एनएसजी) को करीब तीन दिन लग गए। क्या हमारी तैयारी सचमुच इतनी लचर और हम इतने असुरक्षित हैं। दूसरी बात यह है कि सरकार के विभिन्न अंगों में तालमेल की जबर्दस्त कमी है। यह बात जांच में अनिवार्य रूप से निकलेगी और इसी के चलते इस तरह की अपरिहार्य घटनाएं होती हैं। यहां तक कि विभिन्न एजंसियों ने जो भरोसेमंद जानकारियां इकट्ठा की थीं उन्हें एक साथ जोड़ कर नहीं देखा गया, न ही उनसे संबंधित चीजें जोड़ी गईं और न ही उन पर कार्रवाई की गई। यह बात सही है कि हर जानकारी खुफिया सूचना नहीं होती और न ही सभी पर कार्रवाई की जाती है। लेकिन इस मामले में खुफिया सूचनाएं सामयिक थीं, जिसमें कई संकेत और सुराग निकल रहे थे और जिन पर त्वरित और तीव्र कार्रवाई होनी चाहिए थी। यह सब नदारद था। तीसरी बात यह कि हालांकि मीडिया ने न सिर्फ हमें भरपूर सूचनाएं दीं बल्कि हमारी चेतना का स्तर भी बढ़ाया, लेकिन राजनीतिक वर्ग मजाक और अवमानना का पात्र बन गया। यह बात संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। निस्संदेह तमाम स्तरों पर हुई प्रशासनिक लापरवाही बहुत बड़ी और अक्षम्य है। एक लोकतांत्रिक ढांचे में जवाबदेही उसके उसूलों का केंद्रीय तत्व है। मौजूदा चुनौती का सामना करने के लिए तमाम संगठनों और प्रशासनिक ढांचे में बुनियादी बदलाव की जरूरत है। यहां महा प्रशासनिक सुधारों से आगे जाना होगा। उदाहरण के लिए पहले की सरकारं आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो ) में वास्तविक सुधार नहीं कर सकी हैं। आईबी में प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं लेकिन वे राजनीति से प्रभावित हैं और उनका इस्तेमाल सरकारं अपने संकीर्ण हितो के लिए करती हैं। अंग्रेजों ने इस संगठन को अपना शासन मजबूत करने के लिए बनाया था और आजाद भारत की सरकारं चाहे केंद्र की रही हों या राज्य की , वे भी उनका इस्तेमाल अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए करती रही हैं। जहां तक आधुनिक प्रौद्योगिकी के संचालन, उपयोग और निगरानी से लेकर सूचनाएं इकट्ठी करना, संदेशों को जुटाना, उनका समन्वय करना और सबसे महत्वपूर्ण बात उन पर एक पेशेवर स्वायत्तता औ्रर स्वतंत्रता के साथ कार्रवाई करना है तो इस मोर्चे पर बहुत कम सुधार हुआ है। रॉ और सैन्य खुफिया निदेशालय जसे खुफिया सूचना के अन्य संगठनों पर राजनीति भले न हावी हुई हो, पर उनके भी व्यापक आधुनिकीकरण की जरूरत है। चौथी बात यह है कि आज की दु्निया वैश्विक स्तर पर एक दूसर पर ज्यादा निर्भर हो गई है और यह फायदा आतंकी सगठनों को भी मिला है। वैश्वीकरण की एक बुराई आतंक का वैश्वीकरण है। उनके आइडिया , प्लानिंग और उपक रण सरकार से काफी आगे हैं। फिर परस्पर निर्भर विश्व में आतंकवाद से कैसे लड़ा जाए? अगर हमें खुफि या जानकारियों , कौशल और तैयारी के मामले में उनसे आगे रहना है तो समस्त सरकारी ढांचे में व्यापक सुधार की जरूरत है। हमारे संविधान ने केंद्र और राज्य के कामों का जो विभाजन किया है और कुछ काम विशिष्ट तौर पर हर इकाई के जिम्मे छोड़ा है वह एक संघीय ढांचे के तहत काम करने वाली राष्ट्रीय संप्रभुता के व्यापक सिद्धांतों के तहत किया है। वैश्विक स्तर पर जो पारस्परिक निर्भरता बनी है उसने इन सभी विभाजनों को बिगाड़ दिया है। आतंकवाद की वैश्विक चुनौती के प्रति एक समवेत नजरिए के लिए हमें उस नजरिए पर पुनर्विचार करना होगा जिससे हमारा संविधान इन मुद्दों को देखता है। किसी भी संविधान का पुनर्लेखन आसान नहीं होता और उसे राजनीतिक पूर्वाग्रह से मुक्त रखना और भी कठिन होता है। इस बार में बनने वाले आयोग या समितियां जब तक अपना काम पूरा करते हैं तब तक सरकारं बदल जाती हैं। उसके बाद आयोग की रपट आलमारी की धूल फांकती है। पांचवीं बात यह है कि एक एसे संघीय जांच और क्रियान्वयन संगठन की आवश्यकता है जो आंतरिक सुरक्षा के मामले में सरकार के विभिन्न विभागों के बीच व केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच तालमेल कर। साथ ही वह न सिर्फ क्रियान्वयन को मजबूत कर बल्कि त्वरित न्याय के लिए बने फास्ट ट्रैक अदालतों को मदद कर। इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों , कानूनी विभागों, न्यायपालिका और केंद्र व राज्य सरकारों सभी की मदद चाहिए और उन्हें मिलकर काम करना चाहिए। आखिर में हमें एक महत्वपूर्ण सबक यह लेना है कि अगर दोगली राजनीति को छोड़ने का कोई वक्त हो सकता था तो वह यही है। वह काम इसी मुद्दे पर होना चाहिए। किसी भी विकास का कोई अर्थ नहीं है अगर हमारे जानमाल सुरक्षित नहीं हैं। चुनावी फायदे के आगे न देख पाने वाली राजनीतिक पार्टियां भारत के राष्ट्रवाद के साथ भारी अन्याय करती हैं। जब भी यह व्यापक मुद्दे उठाए जाते हैं तो विपक्ष में बैठे दल यह सोचते हैं कि पहल करने और उनके सामने एक योजना प्रस्तुत करने का काम सरकार का है। उसके विपरीत सरकारं विपक्ष पर असहयोग का आरोप लगाती हैं। यह खेल अनिश्चित समय तक चलता रहता है। आज आंतरिक सुरक्षा के साथ भारत गहर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। मुंबई की घटना के बाद पर्यटन, मेहमानवाजी , विदेशी पूंजी के आगमन, और विदेशी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारा सारा विश्वास और भविष्य के बार में कुछ सोच सकने की क्षमता हिल गई है। इससे भारत के बाहरी खतर भी बढ़ेंगे। मुंबई की घटना के आर्थिक असर का अभी आकलन किया जाना है। हम अस्तित्व के बुनियादी मुद्दों और संत्रास की उन स्थितियों में फंसे हैं जहां निर्दोष लोगों की मौत पर सहानुभूति जताने का तरीका ढूंढ़ रहे हैं। एसी अनहोनी को रोकने के लिए हम सामूहिक रूप से क्या कर सकते हैं? हमार राष्ट्रीय मानस पर गहरा जख्म है। इसलिए हमारी समवेत प्रतिक्रिया आज की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठनी चाहिए । भारत को उसी प्रतिक्रिया का इंतजार है। लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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