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कमान और हाईकमान

मुंबई में आतंकी हमले के चलते महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का इस्तीफा और उनके उत्तराधिकारी की खोज के लिए चली उठापटक भारतीय राजनीति के कई पहलू एकसाथ उाागर करती है। देशमुख तब हटाए गए, जब एकाधिक मोर्चो पर सरकारी नाकामी की पराकाष्ठा हो गई थी। प्रशासनिक कुशलता साबित करने के लिए उन्हें काफी वक्त मिला, लेकिन विदर्भ में किसानों की आत्महत्या हो या उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकर के आंदोलन से फैली हिंसा, 2005 की बाढ़ हो या 2006 के रल-धमाके या फिर ताजा आतंकी हमले, उनका प्रशासन बेबस ही नजर आया। आश्चर्य, कि कांग्रेस हाईकमान ने भी कुछ समय पहले तक नेतृत्व परिवर्तन की नहीं सोची, जबकि जनता में लगातार असंतोष बढ़ता जा रहा था। राजनीतिक फैसलों में ऐसी देरी महंगी साबित होती है। शायद मुंबई की आतंकी वारदात के बाद यही भांपकर पार्टी हाईकमान ने देशमुख को हटने का निर्देश दिया, क्योंकि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे और उसमें पार्टी का काफी-कुछ दांव पर लगा है। महाराष्ट्र एक बड़ा राज्य है, और अगले चुनाव में यह राज्य भी उसके हाथ से निकल जाता है तो अन्य राज्यों में कांग्रेस की अखिल भारतीय छवि को भारी नुकसान पहुंचना लाजिमी है। हाल में कर्नाटक, पंजाब, उत्तरांचल उसके हाथ से निकल ही चुके हैं। देशमुख के बाद नए नेता के चयन के लिए पार्टी में खूब लॉबिंग चली है। मराठा या दलित नेताओं में भी किसे चुनें- इस पर भी कम माथापच्ची नहीं हुई। राज्य में राकांपा के साथ गठाोड़ सरकार के नाते उसके अध्यक्ष शरद पवार की पसंद-नापसंद तोलकर काबिल और सबको साथ लेकर चलने, किंतु हाईकमान का विश्वासपात्र चुनना जटिल काम है। संभवत: इसी ऊहापोह में पर्यवेक्षकों को अधिक समय लगा। देशमुख ने विरासत में कई समस्याएं छोड़ी हैं। नया नेता छगन भुजबल, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण, नारायण राणे या सुशील कुमार शिंदे के गुलदस्ते में से जो कोई भी हो, उसे ताजपोशी होते ही तमाम दिक्कतों से जूझना होगा। जनता में सुरक्षा के प्रति आत्मविश्वास लाना और निवेश के लिए उपयुक्त माहौल बहाल करना होगा। गुड गवर्नेस भी देनी होगी, वर्ना नेतृत्व परिवर्तन की क्या अहमियत रह जाएगी?ं

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  • Web Title: कमान और हाईकमान