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बुरा मानो या भला : विचारक असरदार क्यों नहीं

इधर पॉल जॉनसन की ‘इन्टेलेक्चुअल्स’ को मैंने दोबारा पढ़ा। उसमें यूरोप और अमेरिका में बुद्धिाीवियों की भूमिका पर कमाल के लेख हैं। उन बुद्धिाीवियों ने वहां की पीढ़ियों पर अपना असर छोड़ा है। मसलन कार्ल माक्र्स, नीत्शे, रूसो, तॉल्सतॉय, सार्त् और बटेर्र्न्ड रसेल वगैरह-वगैरह। हिंदुस्तान ने भी कई बुद्धिाीवियों को पैदा किया। मसलन राममोहन राय, श्री अरविंद और एम. एन. रॉय वगैरह। आज भी यहां खासा पढ़े-लिखे चिंतक-विचारक हैं, लेकिन अपने समाज पर उनका असर बहुत ज्यादा नहीं पड़ा है। ऐसा क्यों है? हमार बुद्धिाीवी समाज को नहीं बदल पाए। उसकी दो वजह मुझे समझ में आती हैं। एक तो यह कि ये सभी अंग्रेजी में लिखते रहे हैं। उसे बमुश्किल दस फीसदी ही पढ़ और समझ पाते हैं। शायद इसीलिए आम लोग उसे जान तक नहीं पाते। दूसरी वजह यह है कि अपने ज्यादातर लोग राह दिखाने के लिए अपने गुरुओं या आध्यात्मिक गुरुओं की शरण में चले जाते हैं। ये गुरु उनकी जुबान में बोलते हैं। इनका संवाद बातचीत में होता है। उसमें कुछ भी लिखा हुआ नहीं है। गुरुओं का असर बहुत ज्यादा है। लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई बहुत कम है। वे रटी-रटाई धार्मिक किताबों के सहार अपना काम चलाते हैं। उनके ज्यादातर प्रवचनों में भजनों का गाना-बजाना होता है। नाचना तो खर होता ही है। तो उनमें शामिल लोग खुश हो कर लौटते हैं। अपने भीतर शांति महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें नए विचारों से जूझना नहीं होता। इसीलिए उनके लिए जात-पात बड़ा मसला बना रहता है। बच्चियों को दुनिया में आने से रोकना उनके एजेंडे में होता है। हमार गुरु कभी समाज की किसी दिक्कत से रूबरू नहीं होते। मैं नहीं जानता कि मेरा मानना सही है या नहीं। लेकिन मैं इस पर पाठकों की राय जरूर जानना चाहूंगा। वह और सूफी दस साल पहले वह मेर साथ वाले ब्लॉक के एक फ्लैट में आई थी। लेकिन पूरा अपार्टमेंट उसकी मौजूदगी से जगमगा उठा था। हमने उस जसी खूबसूरत औरत नहीं देखी थी। मैंने अपने तमाम दोस्तों से उसका जिक्र किया था। उसके बाद फुसफुसाहट होने लगी थी, ‘ये बूढ़ा सरदार पागल हो गया है। वह किसी से मिलना नहीं चाहता। लेकिन अगर उससे बात करनी हो, तो उस औरत से सिफारिश करानी होगी। उसके लिए तो वह राइडर हैगार्ड के उपन्यास ‘शी’ की हीरोइन है।’ बदकिस्मती से वह साल में एक बार ही सर्दियों में दिल्ली आती है। मैं उसका नाम नहीं बताऊंगा। लेकिन उसे ‘हार्ट्स जॉय’ यानी दिलरुबा कहना चाहूंगा। उसने शायद ही कभी मुझसे किसी के लिए कहा होगा। कुछ वक्त पहले उसने मुझे एक रूमी फाउंडेशन की एक पत्रिका ‘हू’ दी। अरबी में उसका मतलब अल्लाह से जुड़ा है। उस पत्रिका का तीसरा अंक कश्मीर के सूफियों और ऋषियों पर था। मैंने वादा किया था कि अपने कॉलम में उसका जिक्र करूंगा। दरअसल, मैं इधर रूमी में बढ़ती दिलचस्पी से हैरत में हूं। साथ ही कश्मीर के अलग किस्म के इस्लाम ने भी मुझे चौंकाया है। पत्रिका को पलटते हुए मैंने पाया कि उसके पीछे मुजफ्फ र अली हैं। हम दोनों को एक दूसर से ऐलर्जी रही है। तब मुझे लगा कि उन्होंने तो मेरी पड़ोसन को इस काम में नहीं लगा दिया। मैं मुजफ्फर को एक हैंडसम शख्स मानता रहा हूं, जिसमें जमींदार का अंदाज झलकता है। और वह विंटेा कारों का शौकीन है। उन्होंने एक ही अच्छी फिल्म बनाई थी उमराव जान। रखा ने उसमें कमाल की एक्िटंग की थी। उसके गाने भुलाए नहीं भूलते। वह कई साल से हर किसी से कह रहे हैं कि ‘ाूनी’ बना रहे हैं। लेकिन उसकी शुरुआत तक नहीं हुई है। अब वह कहते हैं कि ‘रूमी’ बना रहे हैं। वह फैशन डिााइनिंग से भी जुड़े हैं। अपनी तीसरी हिंदू बीवी के साथ वह अखबारों के पेज तीन पर बने रहते हैं। वैसे भी पैसे की उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उनके कामों को सराहती रहती हैं। वह फंक्शन करने में माहिर हैं। मुझे उनसे जलन होती है। लेकिन उनके लिए वक्त नहीं है। रूमी ने रूहानी और शरीरी दोनों किस्म का लिखा है। अब उनके चहेते भी रूहानियत का ही जिक्र ज्यादा करते हैं। इस पत्रिका के साथ भी यही हुआ है। डॉ. कर्ण सिंह ने कश्मीर में इस्लाम और हिंदुत्व की खास मिली-ाुली तहाीब पर लिखा है। असल में वही ज्यादातर हिंदुस्तानी मुसलमानों के बार में सच है। वे मसिदों में जाते हैं। दरगाह पर मुरादें पूरी करने पहुंचते हैं। डॉॅ. कर्ण सिंह को करिश्मों में भरोसा है। एक बार हारतबल से हारत का बाल गायब हो गया था। तब उन्होंने अपनी महारानी के साथ वहां दुआ की। और अगले ही दिन वह बाल मिल गया था। वाह!

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