DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तनाव से महानगरों में पौरुष खो रहे हैं नौजवान

महानगरों की अंतहीन भागदौड़ भरी जिंदगी। इस भागमभाग में नौजवानों में अच्छा कैरियर बनाने की प्रतिस्पर्धा, एक अदद नौकरी या रोजगार की तलाश, इनमें सफल हो भी जाएं तो जीवन-यापन की जरूरतें बढ़ती ही जा रही हैं। आजकल नौजवान पीढ़ी इससे जूझ रही है। यह पीढ़ी अपने वर्तमान को सुधारने के लिए कुछ ऐसे झंझावतों में फंस रही है जिससे वह भविष्य में हासिल होने वाले पितृत्व सुख को भी गंवा बैठती है। ताजा अध्ययनों के मुताबिक मानसिक तनाव के वैसे तो कई शारीरिक और सामाजिक दुष्प्रभाव सामने हैं लेकिन नई समस्या यह पैदा हो रही है कि इस कारण नौजवानों की प्रजनन क्षमता भी घट रही है। इससे प्रजनन योग्य शुक्राणु तेजी से कम हो रहे हैं। विशेषज्ञ नौजवानों में संतानहीनता की सबसे बड़ी वजह मानसिक तनाव को मान रहे हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) जर्नल में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार अभी तक यह माना जाता रहा है कि मानसिक तनाव से यौन क्रिया पर ही प्रतिकूल असर पड़ता है। लेकिन 2आयु वर्ग के नौजवानों पर किए गए ताजे शोध बताते हैं कि इससे पुरुषों में प्रजननहीनता बढ़ रही है। तनाव से जूझ रहे नौजवानों में शुक्राओं की भारी कमी पाई गई है। शोध के अनुसार प्रजनन के लिए प्रति एमएल सीमेन में 20 लाख शुक्राणु होने चाहिए लेकिन तनावग्रस्त पुरुषों में यह संख्या 3-4 लाख तक रह गई। इनफर्टिलिटी एक्सपर्ट डा. अनूप गुप्ता के अनुसार प्रजनन के लिए हालांकि सिर्फ एक हैल्दी स्पर्म की जरूरत होती है। लेकिन स्वस्थ लोगों मेंप्रति एमएल सीमेन में 10-15 करोड़ तक शुक्राणु होते हैं। लेकिन यदि यह संख्या 20 लाख से कम होती है तो ऐसे लोगों को बच्चे पैदा करने के अयोग्य माना जाता है। तनाव के कारण जहां शुक्राओं की संख्या घट जाती है तथा उनकी गुणवत्ता भी खराब होती है। तनाव से खराब गुणवत्ता के शुक्राणु तो मौजूद रहते हैं जबकि स्वस्थ शुक्राणु नष्ट हो जाते हैं जो आखिरकार संतानहीनता का कारण बनता है। गुप्ता के अनुसार संतानहीनता की चपेट में आने वाले पुरुषों में तनाव पहली सबसे बड़ी समस्या है। इसके बाद स्मोकिंग या तंबाकू का सेवन, अल्कोहल तथा केमिकल एक्सपोजर (दवाइयों के इस्तेमाल का दुष्प्रभाव) है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: तनाव से महानगरों में पौरुष खो रहे हैं नौजवान