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कला का अपमान है रियल्टी शो

शास्त्रीय संगीत की विख्यात शख्सियत और ठुमरी साम्राज्ञी गिरिाा देवी आठ मई 200ो अस्सी वर्ष की हो जाएंगी। उनकी संगीत साधना के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारत के सभी प्रमुख शहरों के अलावा विदेशों में- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस आदि में शास्त्रीय संगीत के कई यादगार कार्यक्रम पेश कर चुकीं गिरिाा देवी को प्रेम से लोग आपा जी कहते हैं। शास्त्रीय संगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी, तानसेन अवॉर्ड, यश भारती, हाफिा अली खां अवॉर्ड और सरस्वती पुरस्कार आदि सम्मानों से विभूषित आपा जी ने पहली बार 1में सार्वजनिक मंच से शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम पेश कर लोगों को मंत्र-मुग्ध किया था। मंचों से गायन के भी साठ साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर उनसे रू-ब-रू हुए हमारे विशेष संवाददाता कृपाशंकर चौबे शास्त्रीय संगीत में आपको सिद्धि मिल गई या और कुछ प्राप्य शेष है?ड्ढr मुझे देश-विदेश के संगीत-प्रेमियों का बहुत-बहुत प्यार मिला है। पर श्रोताओं को रससिक्त करने का आशय यह नहीं है कि सिद्धि मिल गई। मैं साधना में विश्वास करती हूं, सिद्धि में नहीं। मैं 75 वर्षो से शास्त्रीय संगीत की साधना कर रही हूं और भगवान जब तक अनुमति देगा, मैं यह साधना करती रहूंगी। शास्त्रीय संगीत ही मेरा जीवन है। आज भी मैं रियाज करती हूं, गाती हूं और आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में गुरुकुल पद्धति से शिष्यों को सिखाती हूं। इस जीवन में इतना कर पाती हूं, इसे पूर्व जन्म का पुण्य और इस जन्म की मेहनत-लगन का फल मानती हूं। इस समय आपके कितने शिष्य हैं? नई पीढ़ी का रुझान शास्त्रीय संगीत के प्रति कैसा है?ड्ढr अनेक शिष्य हैं। दस-बारह तो ऐसी शिष्याएं हैं, जिनसे मैंने बहुत उम्मीदें पाल रखी हैं। ये शिष्याएं पूरी तन्मयता से ठुमरी को जिंदा रखने में जुटी हुई हैं। रही नई पीढ़ी की बात तो वह जल्दी में है। वह एक साल में ही सब सीख लेना चाहती है। उसके पास लंबे रियाज, स्वरों की तपस्या के लिए धर्य नहीं है। इसीलिए नई पीढ़ी में अनेक लोग शास्त्रीय संगीत की तुलना में लाइट म्यूजिक की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। उसमें उन्हें नाम भी मिल रहा है, दाम भी। बहुत ही कम लोग हैं जो धर्य के साथ शास्त्रीय संगीत सीख रहे हैं। पर वे थोड़े से हैं। इसका अर्थ यह निकाला जाए कि शास्त्रीय संगीत सिमट रहा है?ड्ढr एक अर्थ में तो सिमट ही रहा है। यदि सिमट नहीं रहा होता कि शास्त्रीय संगीत में इक्का-दुक्का कलाकार ही उभरकर सामने नहीं आते। ज्यादा आते। लेकिन ज्यादा तो तब आएंगे, जब उनमें धर्य होगा और तन्मयता होगी। मुझे यमन और भैरव दो राग सीखने में ही तीन साल लग गए थे। पर आज लोगों में वर्षो कोई राग सीखने का धर्य नहीं है। इससे उबरने का उपाय क्या है?ड्ढr इसके लिए जिम्मेदार है- आज का परिवेश। इस परिवेश में प्रकृति के साथ मनुष्य की पारस्परिकता नहीं रही। मनुष्य ने प्रकृति को क्षत-विक्षत किया। इसीलिए हमें शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। आज गंगा-गोदावरी के देश को बोतल में पानी खरीदना पड़ रहा है, दूध की कीमत में। जिस हवा में हम सांस ले रहे हैं, वह प्रदूषित हैं। लोगों का खान-पान बदल गया है। घर के खाने की जगह बाजार का मसालेदार खाना या फास्ट फूड या चाउमिन खा रहे हैं। आज खान-पान के अलावा फैशन की बाढ़ आ गई है। बाजार ने संस्कृति को भी आक्रांत किया है। इस स्थिति से उबरने का उपाय यह है कि लाइट म्यूजिक में भी अवांछित शब्दों का इस्तेमाल न हो। गायकों के लिए साहित्यिक संस्कार जरूरी है। साहित्य और साहित्यकारों से मेल जोल जरूरी है। उससे काफी कुछ ग्रहण किया जाना चाहिए। खान-पान ठीक होना चाहिए। यानी पौष्टिक हो। दिनचर्या ठीक रहे। परिवेश को प्रदूषण से मुक्त किया जाए। इस ओर ध्यान दिया जा रहा हे, यही गनीमत है। यदि आप खतरों की पहचान कर रहे हें, यदि आप देख रहे हैं कि शास्त्रीय संगीत के लिए क्या-क्या प्रतिकूलताएं हैं तो यही बड़ा आश्वासन भी है कि हम उन प्रतिकूलताओं को पार पा लेंगे और शास्त्रीय संगीत का दौर पुन: प्रतिष्ठित कर लेंगे। तभी कला का सम्मान भी बच पाएगा। उसे बचाना जरूरी है। कला का सम्मान क्या खतर में है?ड्ढr आज रियल्टी शो’ज के जरिए कला के नाम पर जो बिकाऊ चीजें परोसी जा रही हैं, वह कला का अपमान नहीं है? मैं यह देखकर कष्ट का अनुभव करती हूं कि महिला कलाकार भी सस्ती लोकप्रियता के लिए समझौते करती हैं। कितनी ही महिलाएं अच्छी गायिका हैं, नृत्यांगनाएं हैं पर अधिकतर उनकी कला भौंडेपन का प्रदर्शन मात्र रह जाती हे। जब तक कलाकार, खासकर स्त्रियां खुद अपना सम्मान करना नहीं सीखेंगी, तब तक दूसरों से सम्मान पाने की भी हकदार नहीं बनेंगी। आपने ठुमरी को विश्वजनीन बनाया। व्यापक परिभाषा में ठुमरी है क्या?ड्ढr ठुमरी शास्त्रीय संगीत का एक प्रकार है। इसे साहित्य भी कह सकते हैं। ठुमरी में श्रंगार, भक्ित, वात्सल्य और विरह के बोल होते हैं। मुझे लोग ठुमरी गायिका ही मानते हैं जबकि मैं खयाल, टप्पा, गीत व भजन भी गाती हूं।ं

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