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क्या हिंसा है मीडिया का रिचर स्केल?

यादा नहीं कैपिटल हिल स्थित अमेरिकी संसद से कोई दो चौराहे पार ही वॉयस ऑफ अमेरिका का दफ्तर है। इस दफ्तर से हिंदी के जो पत्रकार शबो-रो डय़ूटी से बाहर निकलते थे, उनकी नजर कैपिटल हिल पर ही होती थी कि पता नहीं कब उनका दाना-पानी बंद होने का आदेश जारी हो जाए। ऐसे ही माहौल में वाशिंगटन के वॉयस ऑफ अमेरिका के इस दफ्तर में जाने का संयोग हुआ। यह पिछले साल मार्च की बात है। हिंदी प्रसारण सेवा के प्रमुख जगदीश सरीन ने विभाग के सभी पत्रकारों से बैठक तय कर रखी थी। बातचीत में चिंता का केन्द्र यही था कि हिंदी मीडिया और भारत इतना उपेक्षित क्यों है। दो-एक पत्रकारों को छोड़कर सबकी यही राय थी कि चूंकि ौसी घटनाएं भारत में नहीं होतीं, इसलिए यह देश विश्व मीडिया के लिए बेगाना है। हिंदी रडियो सेवा बंद होने के बाद पता नहीं वॉयस ऑफ अमेरिका के पत्रकार कहां हैं, और क्या कर रहे हैं, पर यह सवाल जरूर छोड़ गए कि क्या खूनी मंजर और आतंकवाद ही खबरों की तीव्रता नापने का ‘रिचर स्केल’ बन गया है? इस सवाल पर सोचने की वजह भी है। े बाद मुस्लिम मीडिया, खासकर अरब मीडिया, उससे संबंधित शोध, प्रतिरक्षा और खुफिया सेवाओं में जितने व्यापक पैमाने पर रोगार के अवसर खुले, यह इस धारणा को मजबूत करती है कि हिंसक घटनाओं ने कहीं न कहीं इन इलाकों को प्रभावित किया है। 2001 के बाद अरबी सीखने के लिए यूरोप और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में जिस तरह की होड़ शुरू हुई वह इस बात का सबूत है। अरबी वैसे भी 25 देशों की सरकारी भाषा रही है और अंग्रेजी, फ्रेंच के बाद तीसरी बड़ी बोलचाल की भाषा है। लेकिन े बाद अरबी भाषा से प्रेम लोगों को अचानक नहीं हो गया। उसके पीछे कहीं न कहीं अलकायदा जसे अरब आतंकी थे, जिनके विचारों को समझना और अपनी थोपना गैर अरब मीडिया और खुफिया एजेंसियों के लिए चुनौती थी। े कुछ अरसे बाद वॉयस ऑफ अमेरिका की अरबी सेवा ने तालिबान नेता मुल्ला मुहम्मद उमर का बयान प्रसारित किया। इस पर अमेरिकी विदेश विभाग को आपत्ति थी कि अतिवादियों को ‘प्लेटफार्म’ दिया जा रहा है। जो संपादक प्रोफेशनल आजादी का राग अलाप रहे थे, वे नप गए और अरबी सेवा बंद हो गई। लेकिन इसके तुरंत बाद मिडिल ईस्ट रडियो नेटवर्क या रडियो सावा नाम से अरबी सेवा की शुरुआत हुई जिसका आरंभिक बजट एक अरब 20 करोड़ डॉलर था। ‘रडियो सावा’ संक्षिप्त समाचार बुलेटिन के साथ-साथ पश्चिम के पॉपुलर म्युजिक का प्रसारण 71 देशों के लिए करता है। इस घटना के बाद बीबीसी, जर्मनी, रूस और फ्रांस के प्रसारकों के बीच अरबी कार्यक्रम को लेकर जो प्रतिस्पर्धा हुई, वह देखने वाली थी। सरकारों ने बजट के ‘फ्लड गेट’ खोल दिए। ‘फ्रांस-24’, ‘एशिया अल अय्यूब’ और बजट संकट के बावजूद इस साल 11 मार्च को बीबीसी ने अरबी टीवी चैनल की शुरुआत की। इनके मुकाबले मध्य-पूर्व से अल आलम, अल अरबिया, अल हुर्दा, अल जजीरा प्रसारकों ने कई मौकों पर अरब अतिवादियों को मंच मुहैया कराए। यह भी सच है कि अरबी मीडिया के मोटे होने के साथ-साथ फारसी, दारी, पश्तो, उर्दू, बांग्ला, अल्बानी, एमहेरिक, आर्मेनियाई, कुर्द, तुर्की, उक्रेनी, उाबेक, भाषा इंडोनेशिया वेब, प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक सेवाएं फलती-फूलती गई हैं। शायद ही किसी विदेशी प्रसारक ने इनकी सेवाएं बंद की हों। इसकी वजह आतंकवाद भी है, इस तर्क को एकदम से खारिा कर देना सच से आंख मूंद लेना होगा। पिछले सात वर्षो में क्या दिखाना, प्रसारित करना और छापना है, इसे लेकर आचार संहिताओं में सुधार के जो काम पश्चिम में हुए हैं, उसकी तारीफ होनी चाहिए। मीडिया के क्षेत्र में जवाबदेही की दृष्टि से े बाद यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। पर यह बहस का विषय जरूर है कि संपादकीय गाइड लाइन के मामले में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और पश्चिमी देश पूरी दुनिया के चौधरी क्यों बन बैठे हैं? क्या कारण है कि कतर को छोड़कर सभी अरब देशों ने पश्चिमी मॉडल को मान लिया है? रूस में किसी आतंकी के साक्षात्कार से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक है। आस्ट्रेलियाई कानून एसीएमए-2005 के तहत आतंकियों को मंच देने वाले मीडिया को कड़ी सजा का प्रावधान है। तो क्या इसका दुरुपयोग नहीं होता होगा? बीबीसी ने आतंकवाद की व्याख्या के बरक्स बहस की काफी गुंजाइश दे दी है कि किसे हमलावर कहें, किसे आतंकी। यह बहस 10 में तब के संपादक डेविड स्पाउल की ‘गाइड लाइन’ से चली आ रही है, जो जुलाई 2005 के लंदन हमलों से तेज हुई। इस बहस को एक बार फिर से मुंबई हमलों के बाद से विस्तार मिला है। शायद पहली बार मुंबई हमले की घटना अरब, क्षराइल, पश्चिमी अखबारों और टीवी के लिए लगातार हफ्तेभर लीड बनी। क्या इसके पीछे यहूदी वर्चस्व वाले मीडिया संगठनों का कोई रोल रहा है? या कि इस भयानक हिंसक कार्रवाई को नजरअंदाज करना नामुमकिन था?ं

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