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राजनीति ही हराएगी आतंकवाद को

भारत के लिए आतंकवाद कोई नई बात नहीं है। देश में अभी आजादी की पौ ही फूटी थी कि महात्मा गांधी को गोली मार दी गई थी। 24 साल पहले एक प्रधानमंत्री ने सिर्फ धर्म के आधार पर ही अपनी सुरक्षा कर्मियों को बदलने से इनकार कर दिया था, उन्हें उनके सरकारी निवास में ही मार डाला गया। संकट की घड़ी में हमें नेतृत्व की जरूरत होती है। और फिलहाल दिक्कत यह है कि इस समय का राजनैतिक नेतृत्व लोगों को वह आश्वासन नहीं दे पा रहा, जिसकी उन्हें जरूरत है। जो सत्ता के शिखर पर बैठे हैं, वे जनता से एकाुट रहने की अपील भी नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस ने कई आला पदों पर बैठे लोगों को बदलने की नीति अपनाई है, लेकिन इसका लोगों पर कोई असर नहीं दिखाई पड़ा। किसी भी नौकरशाह ने न तो इसकी जिम्मेदारी ली और न ही उससे इस्तीफा मांगा गया। गृहमंत्री से इस्तीफा ले लिया गया लेकिन गृह सचिव अपनी जगह बरकरार रहे। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को पद छोड़ना पड़ा, लेकिन राज्य सरकार के एक भी अधिकारी का बाल बांका नहीं हुआ। इस समय राजनीतिकों के खिलाफ जो क्षोभ दिखाई पड़ रहा है, उसे समझा जा सकता है लेकिन वह हमें कहीं ले जाने वाला नहीं है। सैनिक समाधान की बात की जा रही है, लेकिन इसे नजरंदाज करते हुए कि पाकिस्तान ने अपना आधा जीवन सैनिक शासन में ही बिताया है और इस समय वह खुद में ही काफी विस्फोटक जगह है। कोई यह विश्वास नहीं करता कि सेना का इस्तेमाल करके श्रीलंका में शांति कायम की जा सकती है। अगर नेता नाकाम हुए हैं तो उन्हें वोटों से ही बदलना होगा। भारत अगर सरहद के पार प्रशिक्षण शिविरों पर हमला बोल भी दे तो भी वह एक ऐसे दुश्मन से मुकाबिल होगा जो परंपरागत सेना की तरह काम नहीं करता। इसमें तो वही हालत होगी जो सूडान में अमेरिका की हुई। किसी जगह पर बम गिरा देना आसान है, लेकिन सही लक्ष्य का पता लगाना काफी कठिन काम है। पाकिस्तान की आधी से ज्यादा फौा बलूचिस्तान, सीमांत प्रांत और कबीलाई इलाकों में उलझी हुई है। भारत इस समय फायदे की स्थिति में है। पश्चिमी देशों की दिलचस्पी इस समय यही है कि पाकिस्तान की पूर्वी सीमाओं पर शांति बनी रहे, लेकिन यह शांति तभी तक बनी रहेगी जब भारत और भारतीयों की सुरक्षा बनी रहे। भारत और पाकिस्तान की जो स्थिति है वैसा दुनिया में कोई और उदाहरण नहीं है। दुनिया के किसी भी बड़े लोकतंत्र के पड़ोस में ऐसी परमाणु शक्ित नहीं है जिसकी जमीन का इस्तेमाल आतंक के निर्यात के लिए किया जाता हो। यह ऐसी समस्या है जो पाकिस्तानी जनता के लिए भी परशानी का सबब बनती है। एक-चौथाई शताब्दी से भी ज्यादा समय से पश्चिमी ताकतों की मदद से पाकिस्तान के फौाी जनरल और वहां की खुफिया एजेंसियां देश के भीतर ही अपनी एक अलग राज्यसत्ता चला रही हैं। यह अराजकता पहले अफगानिस्तान में निर्यात की गई, फिर कश्मीर में और अब तकरीबन पूरी दुनिया का ही सरदर्द बन गई है। हालांकि अमेरिका में 11 सितंबर की घटना के बाद से पाकिस्तानी फौा और खुफिया एजेंसी दोनों को ही आतंक के खिलाफ लड़ाई का केंद्रीय तत्व बना दिया गया है। हादसे के तुरंत बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ रातों-रात तालिबान समर्थक से तालिबान विरोधी बन गए थे। तब उन्होंने ऐसे मामलों में भारत को भी सहयोग का आश्वासन दिया था। लेकिन सात साल बाद भारत के नेताओं और आम जनता के लिए अब इस आश्वासन का कोई अर्थ नहीं बचा है। पाकिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार है, लेकिन उसका वास्तविक नियंत्रण कितना है, यह विवाद का विषय है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे और भी चिंता का विषय है, उनसे पता पड़ता है कि जरदारी की शक्ितयां कितनी सीमित हैं। तस्वीर का एक और पहलू भी है जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जार्ज बुश के मुकाबले भावी राष्ट्रपति ओबामा की यह धारणा ज्यादा पुख्ता है कि आतंक के खिलाफ सेना के इस्तेमाल की सीमाएं हैं। दूसर यह कि पाकिस्तान के जिस तंत्र के भरोसे यह लड़ाई लड़ी जा रही है, उसी ने दशकों तक पाला और पोसा है। फिर अमेरिका की प्राथमिकता अफगानिस्तान और अलकायदा है। भारत इन प्राथमिकताओं में नहीं आता। भारत की अपनी चिंताएं हैं, जो एशिया के कई दूसर बड़े देशों के साथ जुड़ती हैं। मुंबई में हुआ हमला जिस तरह से योजनाबद्ध था, वह यह तो बताता है कि हिंद महासागर, और अरब सागर के देशों के साथ क्या हो सकता है। अगर कोई आतंकवादी गुट मुंबई पर हल्ला बोल सकता है तो कोई कारण नहीं है कि वह दुबई पर नहीं बोल सकता। पाकिस्तान इस समय भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है और हाल ही में उसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से साढ़े सात अरब डॉलर की मदद मांगी है। अगर कहीं न्यूयॉर्क, लंदन या पेरिस पर हमला हो जाए तो क्या यह मदद स्वीकृत हो पाएगी। यूरोप और अमेरिका के लिए ये शहर जितने महत्वपूर्ण हैं, एशिया के लिए मुंबई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आर्थिक दबाव या उनकी धमकी ज्यादा अच्छा काम कर सकती है, लेकिन इसके लिए भारत को अपनी विदेश नीति में बदलाव लाना होगा। उसे सरकार से आगे बढ़कर सोचना होगा। 1में जब ढाका में नरसंहार हुआ था तो जयप्रकाश नारायण को अमेरिका भेजा गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद कई देशों की राजधानियों में गई थीं और दुनिया व प्रेस के सामने भारत की स्थिति को पेश किया था। भारत में आज भले ही उस कद के नेता न हों लेकिन विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित लोगों को इकट्ठा करके यह काम किया जा सकता है। तीन साल पहले जिन उद्योगपतियों और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स ने दावोस में इंडिया वीक का आयोजन किया था उन्हें देशहित में यह काम करने के लिए भी कहा जा सकता है, लेकिन यही वह जगह है जहां आज के राजनीतिज्ञ नाकाम हो जाते हैं। मुंबई की वारदात के बाद जो सर्वदलीय बैठक हुई थी उसमें पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पहुंचे ही नहीं। पाकिस्तान से निपटने में उनका अनुभव काफी काम का हो सकता था। आतंक भारत को नहीं हराएगा, भारत ही आतंक को हरा सकता है। वह हराएगा भी। बस हमें अपनी ऊरा और प्रयासों को एकाुट करना होगा। लेखक राजनीतिक समीक्षक और इतिहासकार हैं।

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