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20 फरवरी, 2020|7:16|IST

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जीत तो जाति, निजी छवि ही तय करते हैं

चुनावी समर में पार्टयिां चाहे कितना प्रचार करं, मुद्दों का बखान करं या विवादास्पद चर्चाएं कर माहौल बनाएं, जीत आखिरकार पार्टी के उम्मीदवार के व्यक्ितत्व ,छवि और जाति पर ही निर्भर करती है। लेकिन इस उम्मीदवार की जीत भी तभी संभव है जब वह एक साधारण से फामरूले पर खरा उतरता है। चुनाव विश्लेषक चाहे जो तर्क दें, आमतौर पर चुनाव जीतने के लिए जो टोटके काम में आते हैं उनमें पहला है,उम्मीदवार की अपनी पार्टी का कोर मतदाता यानी काडर वोट, दूसर उम्मीदवार की अपनी जाति का वोट तथा तीसरा एक या एक से अधिक समुदायों के वोटों का वोटों का ऐसा हिस्सा जो जीत का मार्जिन बढ़ाता है या जीत का आंकड़ा मुहैया करवाता है। उदाहरण के तौर पर गौतमबुद्ध नगर से कांग्रेस के रमेश चंद्र तोमर (भाजपा में टिकट न मिलने पर कांग्रेस में आए) जीतना चाहते हैं तो उन्हें कांग्रेस का परंपरागत वोट चाहिए, साथ ही उनकी जाति ठाकुर समुदाय का वोट उन्हें चाहिए और इसके अलावा उन्हें वोटों का एक और हिस्सा चाहिए तो दलित, गुर्जर और मुसलमानों का हो सकता है। जिले में तीसर नंबर के इन वोटों की संख्या दो लाख से ज्यादा है। यही वोटर जीत की तराजू को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में झुकाने का माद्दा रखते हैं। यही स्थिति गाजियाबाद में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह की है। लेकिन कम मतदान की स्थिति में यह फामरूला उतना प्रभावी नहीं रहता। कम मतदान की हालत में काडर आधारित पार्टी ही अच्छा प्रदर्शन करती है। मेट्रो शहरों जसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चैन्नई और बैंगलोर में यह फामरूला उतना सटीक नहीं है क्योंकि यहां अन्य राज्यों से आकर बसे लोग भी रहते हैं जिनकी आस्थाएं और जातियां इस फामरूलें में फिट नहीं बैठतीं। तीन चरणों में अब तक 372 सीटों पर चुनाव हो चुका है, जिसका औसत लगभग 57.5 फीसदी है जो 2004 के चुनावों से आधा फीसदी ही ज्यादा है। चौथे, पांचवें चरण में 7 और 13 मई को क्रमश: 85 व 86 सीटों पर चुनाव होना है।

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