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अगली लोस का अंदाजा दूर की कौड़ी

विधानसभा चुनाव परिणाम से अंदाजा लगाना दूर की कौड़ी होगी कि अगली लोकसभा कैसी होगी। हां, नतीजों से कुछ बातें साफ हैं और इसलिए यह जोड़-घटाव हो सकता है कि दोनों ही पक्षों ने सीख न ली तो उन्हें नतीजे भुगतने पड़ेंगे। इसमें शक नहीं कि अब वह फेा आ गया है कि लोग विकास की राह में रोड़ा नहीं चाहते। दिल्ली में कांग्रेस और मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन न होने का एक कारण बेहतर विकल्प न दिखना भी था।ड्ढr ड्ढr लेकिन राजस्थान का संदेश दूसरा है। राजनीतिक समीक्षक महेश रंगराजन कहते हैं, ‘वसुंधरा राज में विकास हुआ लेकिन भाजपा हार गई। कारण शायद यह है कि विकास के नाम पर शहरों से जुड़ी जमीन का सरकार ने जिस तरह अधिग्रहण किया, उसे पसंद नहीं किया गया। फिर शहरी-ग्रामीण विकास में तालमेल नहीं रहा। लोकसभा चुनाव की दृष्टि से कांग्रेस को इस मामले में सतर्क रहना होगा।’ रंगराजन यह भी मानते हैं कि आतंकवाद पर भाजपा को अपनी सोच बदलनी होगी। नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्िटव स्टडीा के चेयरमैन डॉ. मंजूर आलम को तो इस मुद्दे पर भाजपा से कोई आशा नहीं लेकिन वे कांग्रेस को भी सतर्क करते हैं, ‘आतंकवाद से निबटने में अगर न्याय प्रक्रिया को सेकुलर डेमोक्रेसी के संदर्भ में नहीं अपनाया तो लोस चुनावों में कांग्रेस खामियाजा भुगतेगी।’ इन चुनावों में बसपा की उपस्थिति दमदार नहीं रही। क्या लोकसभा चुनाव में ऐसा ही होगा? दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ‘नहीं, तब मायावती प्रधानमंत्री-पद की उम्मीदवार होंगी और इस फैक्टर को नजरअंदाज करना गलत होगा।’

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