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दिल्ली अभी भी दूर है

चुनाव के नतीजे सभी के सामने हैं। भाजपा के हौसले पस्त हैं। इस दल के बड़बोले नेता और कार्यकर्ता सपने संजोने लगे थे दिल्ली के तख्त पर कब्जा करन के। शीला दीक्षित की हैट्रिक ने इन्हें चकनाचूर कर दिया। न तो आतंकवाद का हौवा कांग्रेस की जीत को रोक-टोक सका और न ही महंगाई का रोना-धोना भाजपा के काम आया। बेचारे नीरस मास्टरी मुद्रा के मारे विजय कुमार मल्होत्रा को दोष देना बेकार है। अगर इससे बेहतर जीत सकने वाला कोई उम्मीदवार भाजपा के साथ था तो उसे मैदान में क्यों नहीं उतारा गया और किस दिन के लिए बचा कर सैत रखा गया? कड़वा सच यह है कि शीला जी से टकरान का हौसला किसी भी तेजस्वी समझे जाने वाले भाजपाई का नहीं था- न सुषमा स्वराज का और न ही अरुण जेटली का। जीत तक दूसरी पंक्ित के जुझारू नेता डॉ़ हर्षवर्धन सरीखे लोगों का सवाल है, असलीयत यही नजर आती है कि चोटी पर विराजमान राष्ट्रीय स्तर के अपेक्षाकृत कम उम्र नेता किसी प्रतिद्वंद्वी को उभरन का, ऊपर उठन का मौका ही नहीं देना चाहते। अपने बलबूते पर बार-बार गुजरात को भाजपा की झोली में डालने वाले नरेंद्र मोदी ही जाने कितने साथियों की नींद हराम कर चुके हैं! रंग-बिरंगे पंख फैलाकर राष्ट्रीय पक्षी मोर बने नाचन के आदी अपने बदशक्ल पैरों की ओर नजर डालने से हमेशा कतराते रहें हैं। मीडिया के बनाए प्रभामंडल से दर्शकों को चौंधियाते वे यह भूल जाते हैं कि स्वयं वे कितना जनाधारविहीन हैं। यह तो अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे लोगों का सौभाग्य है कि स्वयं कांग्रेसी प्रधानमंत्री के राज्यसभा वाले पिछले दरवाजे से संसद में पहुंचने के कारण इस कमजोरी का पर्दाफाश विपक्षी नहीं करते और खुद को मोर समझने वाले यह शुतमरुर्ग रेत में सर दबाए मतदाता रूपी बिल्ली से बेखबर दिलफरेब सपने देखते दिखलाते रहते हैं। एक और बात का जिक्र जरूरी है। दिल्ली के राजपाट के आगे पसारी हथेली से सरकता देख खिसियाए भाजपाई विजय कुमार मल्होत्रा की पकी उम्र को दोष देने लगे हैं। यहां दो अहम बातें याद रखना बेहद जरूरी है। 70 वर्षीय शीला जी की चुस्ती-फुर्ती को देख कर उनकी उम्र का सही अंदाजा लगा पाना कठिन है, पर सच यह है कि वह और विजय जी एक ही पीढ़ी के कहे जा सकते हैं। दूसरी बात और भी विडंबना वाली है। जिस पार्टी में आगामी राष्ट्रीय चुनावी शक्ित परीक्षा के लिए 80 से अधिक उम्र वाले, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठन को व्याकुल मारोरजी भाई का रेकॉर्ड तोड़ने को आकूल भीष्म पितामह सरीखे महारथी को अपना उम्मीदवार नामजद किया हो उसे उम्र वाली कसौटी इस्तेमाल करन की इतनी बेचैनी क्यों? दूसरों के परेशानी का मजा लेने वाल कुछ यार लोग इस वक्त सुझाने लगें हैं कि मिथकों और पुराणों को इतिहास समझने वालों को यह याद रखना चाहिए कि महाभारत में उसी पक्ष को हार का मुंह देखना पड़ा था, जिसके साथ भीष्म पितामह थे। यह तो हुई भाजपा की हार की बात इसी तरह देश की राजधानी में कांग्रेस की जीत का भी निर्मम और तटस्थ मूल्यांकन करने की जरूरत है। नम्बर दस जनपथ के दरबार और सोनिया जी की पारिवारिक भजनमंडली चाहे कितने ही खड़ताल-मजीरे बजाए, ढोल पीटे, यह जीत कांग्रेस की उतनी नहीं जितनी शीला जी की है। उनका करिश्माई व्यक्ितत्व, प्रशासकीय कौशल और अपनी पार्टी के भीतर बैठे शत्रुओं को चारों खाने चित्त करने वाली प्रतिभा अद्वितीय है। अगर जनता-मतदाता का मोहभंग भाजपा से विचारधारा के आधार पर या उसके घोषणापत्र-प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर है तो इसका असर निश्चय ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कुछ न कुछ देखन को मिलता। राजस्थान में कांग्रेस को जीतान का काम राहुल गांधी के श्रमदान ने नहीं, बल्कि अशोक गहलोत के पिछले पांच साल के खामोश अभियान ने किया। शायद इससे भी पहले भाजपा की तथाकथित जीत का सेहरा रानी साहिबा वसुंधरा राज के सर बांधा जाना चाहिए। उनकी हेकड़ी और अहंकारी अकड़ गुजरे जमान की होती और भाजपा को यह दुर्दिन देखना नहीं पड़ता। आज भले ही भाजपाई यह रट जारी रखे हैं कि उनके प्रशासनीक उपलब्धियां अद्भुत हैं और उन्होंने अपने कार्यकाल में जाने इतने सारे अच्छे काम करवाए हैं, राजस्थान के कृतघ्न मतदाता को जो बात याद आती है, वह सरकारी गोलीबारी में जान गंवाने वाले निहत्थे नागरिकों और रक्तरंजित गुर्जर मीणा संघर्ष की है। यह समझ पाना ठीक है कि वसुंधरा राज को आज भी राष्ट्रीय स्तर का नेता साबित कर भाजपाई क्या हासिल करना चाहते हैं। उस बात को नजरंदाज करना कठिन है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा न कांग्रेस को अच्छी तरह धूल चटा दी है। यहां फिर यह दोहरान की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि शिवराज सिंह और रमन सिंह अपने बलबूते पर जीते हैं कि संघ परिवार को भुनाने से नहीं। अगर मध्य प्रदेश का मतदाता भगवा ध्वजाधारी ही होता तो उसमें कलकतिया ममता बनर्जी के समान चीरकर्कशा उमा भारती को ऐसा सबक न सिखाया होता। इसी तरह अगर सोनिया जी पर आंख मूंद कर भरोसा करने वाला मतदाता छत्तीसगढ़ में बस रहा होता तो शायद अजीत जोगी अगली पारी खेलन का इंतजार करन को मजबूर नहीं होते। व्हीलचेयर पर सवार चुनाव अभियान में जुटे अजीत जोगी ने दर्शकों का दिल भले ही जीता हो अपने प्रदेश के मतदाता को रिझाने में बुरी तरह असफल रहे। सोनिया गांधी का प्रिय पात्र होन का भी कोई लाभ उन्हें नहीं मिल सका। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में दो और बातें याद रखन की हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह बात स्वीकार की है कि नक्सलवादी हिंसा के कारण इस राज्य में चुनाव करवाना जम्मू-कश्मीर से भी अधिक कठिन रहा है। यह बात काफी अटपटी लगती है कि माओवादियों पर काबू पाने में नाकाम रमन सिंह को इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा। उनकी सरकार पर मानवाधिकारों के हनन के आरोप भी लगातार लगाए जाते रहे हैं। इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं कि इसका कोई असर मतदाता पर पड़ा। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मद्देनजर यह बात कर्तइ नहीं स्वीकार की जा सकती कि इन चुनावों में जनादेश कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता को या उसकी नीतियों को दिया गया है। खासकर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की जीत के लिए कांग्रेस की आंतरिक फूट जिम्मेदार रही। हार के बाद ही युवा सिंधिया साहब को सामने आने और मुंह खोलन का मौका दिया जा रहा है। कमलनाथ शुरू-शुरू में एक झलक दिखलाकर जान कहां नदारद हो गए। राज्य कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी को भी चुनाव अभियान की लगाम पूरी तरह नहीं सौंपी गई। सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया व्हीलचेयर पर सवार एक दूसरे महारथी भीष्मपितामह अजरुन सिंह ने। पुत्र मोहग्रस्त धृतराष्ट्र की तरह समझा जा सकता है पर तर्कसंगत नहीं। चाणक्य समझे जाने वाले दिग्विजय कुछ नहीं कर-धर पाए। कुल मिलाकर दिल्ली दरबार में किसकी तूती बोलेगी अगले चुनाव में आज भी अस्पष्ट है। दिल्ली दर्पण आज भी माया दर्पण बना हुआ है। लेखक जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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