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झारखंड के भी होते एसे नसीब

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम पर झारखंड के राजनीतिक हलकों में भी चर्चा- समीक्षा हो रही है। प्रमुख नेताओं की टिप्पणी का लब्बोलुआब यही है कि जनता ने काम का दाम दिया है, अन्यथा दिल्ली-छत्तीसगढ़ में एंटीइंकबेंसी हावी ही होता। कम- से- कम दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणाम को झारखंड के परिप्रेक्ष्य में परखा- तौला जा रहा है। झारखंड के साथ ही छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना था। आदिवासी बहुल इलाका और उग्रवाद की काली छाया भी। सूबा कहां से कहां चला गया राजीतिक फलक पर इसकी दो टूक चर्चा होने लगी है। छत्तीसगढ़ में जनता ने स्पष्ट फैसला दिया है। भाजपा के रमण सिंह ने फिर से परचम लहराया है। दिल्ली की बात ही अलग है।ड्ढr कांग्रेस की शीला दीक्षित ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी कार्यक्षमता साबित की है। मुंबई की घटना के ठीक दूसर दिन दिल्ली में वोट डाले गये थे। तरह- तरह के कयास लगाये जा रहे थे, लेकिन परिणाम ने सभी कयासों को खारिा किया है। दूसर राज्यों के चुनाव परिणामों पर गौर करने से से झारखंड की दिशा- दशा पर अफसोस के सिवा कुछ भी नहीं। अलग राज्य गठन के बाद भी झारखंड में किसी दल के पास सरकार बनाने को स्पष्ट बहुमत नहीं था। 2005 के विधानसभा चुनाव में तो समीकरण और भी गड़बड़ाये। ना एंटी इनकबेंसी दिखी और ना ही सरकार के काम को जनता का इनाम। निर्दलीयों की मराी पर ही सरकार की किस्मत टिकी। सबसे बड़ा दल होते हुए भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। 2000 से अब तक सियासत के जितने रंग दिखे और नाटकीय राजनीतिक खेल हुए इससे पूरा देश वाकिफ है। फ्रैक्चर जनादेश और साल- दो साल के लिए बनती सरकार- बदलती कुर्सी। महत्वाकांक्षा तथा टांग खिंचाई की राजनीति ने 2003 में झारखंड में बबूल के जो बोये वह फलता- फूलता चला गया। आठ साल में छह बार कुर्सी बदली। कभी नौ दिन, कभी दो साल का नेतृत्व रहा। यूपीए की मेहबानी - मजबूरी से निर्दलीय मधु कोड़ा ने भी दो साल तक नेतृत्व संभाला। आठ सालों में नीति- सिद्धांत की धज्जियां उड़ीं और काम के नाम पर सिर्फ चोंचलेबाजी। ऐसे में दिल्ली- छत्तीसगढ़ का परिणाम झारखंड के लिए कसक ही है।

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