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संत गोरा जी कुम्हार

महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर के समय में अनेक संत हुए। इनमें सबसे बड़ी उम्र के थे- गोरा कुम्हार। गोरा जी कुम्हार तरढोंकी नामक स्थान में सन् 1267 ई. के लगभग प्रकट हुए थे। वे बचपन से ही आदरणीय थे। यही कारण था कि छोटे-बड़े सभी इन्हें ‘काका जी’ या ‘चाचा जी’ कहते थे। बड़े होकर भी, घर गृहस्थी के बंधन और दो पत्नियों का आकर्षण उन्हें बांध न सका। वे माया-मोह से दूर, भजनानंद में लीन रहते। एक बार ज्ञानेश्वर, मुक्ताबाई, नामदेव आदि संत इनके यहां ठहर हुए थे। पास ही ‘चाक’ और ‘थापी’ रखे हुए थे। मुक्ताबाई ने थापी देखकर गोरा जी कुम्हार से पूछा कि ये क्या है? गोरा जी ने बताया कि इसे थापी कहते हैं। चाक से बर्तन निकालकर, इस थापी से उसे ठोंकते हैं और देखते हैं कि घड़ा कच्चा है या पक्का। यह सुनकर मुक्ताबाई ने कहा- ‘हम लोग भी तो घड़े ही हैं। इस थापी से क्या आप हमार बार में भी बता सकते हैं?’ गोरा जी ने कहा- ‘हां-हां, क्यों नहीं?’ वह थापी एक-एक संत के सिर पर ठोंक कर देखने लगे। संत नामदेव को यह पसंद न आया। जब गोरा जी ने नामदेव के सिर पर थापी ठोंकी तो बोले- ‘संतों में यही घड़ा कच्चा है।’ फिर वह नामदेव से बोले- ‘नामदेव! तुम भक्त हो, ज्ञानी हो, किन्तु अहंकारी हो। जब तक अहंकार नहीं त्यागोगे, तुम कच्चे ही रहोगे। अच्छा हो कि तुम किसी गुरु की शरण में जाओ।’ नामदेव दु:खी हुए। कुछ समय बाद पण्ढरपुर में आराध्य श्रीविट्ठल से नामदेव ने अपना दुख कहा। श्रीविट्ठल ने उन्हें समझाया, ‘गोरा जी ने जो कहा है, वह सच है। गुरु का आशीर्वाद लिए बिना तुम कच्चे ही रहोगे। गोरा जी कुम्हार वेदान्त में विश्वास करते थे। उनके रचित अभंगों में वेदान्त की ही व्याख्या मिलती है। महाराष्ट्र में भक्त और संत उनके अभंगों को बड़े भक्ित भाव से गाते हैं।

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