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केरल: बेवजह विवाद की भाषा

ेरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन को मुंबई की आतंकवादी वारदात के शहीद के पिता पर अपमानजनक टिप्पणी के लिए काफी तीखी आलोचना झेलनी पड़ी। हालांकि बाद में उनकी कुत्ते वाली टिप्पणी को लेकर विवाद तब थोड़ा ठंडा पड़ गया, जब उन्होंने कुछ दिन बाद ही विधानसभा में माफी मांग ली। किसी रिटायर सैनिक अफसर के बेटे की शहादत के मौके पर इस तरह की भाषा के इस्तेमाल कोई सफाई नहीं हो सकती, लेकिन इसमें कई ऐसी चीजें हैं जिन्हें लेकर जानकार लोग काफी उलझन में हैं। एक तो यह कि वरिष्ठ माकपा नेता इस तरह के भाषा के इस्तेमाल के लिए नहीं जाने जाते। कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करते। मुमकिन है कि क्षणिक आवेग में वे ऐसा कर गए हों। लेकिन ऐसा होता तो वे तुरंत ही माफी भी मांग लेते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर जो हुआ उसे लेकर केरल में कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई। केरल के हिसाब से देखें तो यह भी एक अजीब बात ही है, ऐसे मौकों पर केरल खुद को काफी जागरूक साबित करता है। और हां मलयालम मीडिया ने इस खबर को जिस तरह से पेश किया वह भी काफी अलग था। यह सब क्यों हुआ, इसको समझना भी दिलचस्प होगा। पूरा विवाद जिस शब्द को लेकर हुआ वह था ‘पट्टी’। मलयालम भाषा के इस शब्द का अर्थ होता है कुत्ता। लेकिन मलयालम भाषा में यह एक मुहावर की तरह इस्तेमाल होता है और इसका अर्थ उतना अपमानजनक नहीं होता जितना कि यह शब्द हिंदी और अंग्रेजी में होता है। आतंकवादी वारदात में मार गए कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन ने अपने बेटे के दाह संस्कार तक अपने धर्य को बनाए रखा, लेकिन अगले ही दिन वे आपे से बाहर हो गए। जब उन्हें पता पड़ा कि अच्युतानंदन उनके घर आ रहे हैं तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि उन्हें किसी राजनीतिज्ञ की जरूरत नहीं है। लेकिन फिर भी मुख्यमंत्री गए और उन्हें दरवाजे से उल्टे पांव लौटना पड़ा। अगले दिन जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अगर उनके पिता नहीं चाहते थे वे गए ही क्यों थे। अच्युतानंद का जवाब था, ‘अरु पट्टयम वरंडा’, जिसका अर्थ हुआ कौन कुत्ता वहां जाएगा। और इसी जवाब ने भारी विवाद पैदा कर दिया। संदीप उन्नीकृष्णन की शहादत पर ढेर सारी खबरं देने वाले मलयालम मीडिया ने इसे मुद्दा नहीं बनाया, उनके लिए यह उतनी अपमानजनक टिप्पणी नहीं थी। इसी वजह से केरल के राजनीतिज्ञों ने भी इसे नहीं उठाया। हालांकि वे चुप रहे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अगर विवाद उठता है उन्हें कुछ फोयदा तो मिल ही जाएगा। बाकी देश भर के मलयाली इस बेमतलब मुद्दे पर हंसने के अलावा कर ही क्या सकते थे। इस सार नाटक ने उस विवाद की याद ताजा कर दी जो अस्सी के दशक में पूर देश में उठा था। तब तेलुगू देशम पार्टी के नेता एन. टी. रामाराव ने कांग्रेसियों को ‘कुत्ता’ कह दिया था। ऐसे मामलों में दिक्कत तब आती है जब आप एक भाषा के मुहावर का शब्दश: अनुवाद करके उस अनुवाद को अंग्रेजी के पैमाने पर रखते हैं। फिल्मी स्टार से राजनेता बने नंदमूरि तारक रामाराव के भाषणों में मुहावरों की भरमार रहती थी। एक अन्य मौके पर उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को ‘कूका मूत्ती पिंडेलू’ कह दिया था। तेलुगू भाषा में इस मुहावर का अर्थ होता है बूढ़े हो चुके पेड़ के फल, जिनमें अब पहले जसी ताकत नहीं रही। लेकिन इसका एक शब्द है कूका, जिसका अर्थ होता है कुत्ता। लेकिन अगर उनके पूर मुहावर को देखें तो उनका यह आशय कहीं नहीं था कि उनका व्यवहार कुत्ते जसा होता है। उस समय यह विवाद भी मीडिया पर खासा छाया रहा था। देश भर के कांग्रेसियों ने तो खर इसका जोरदार विरोध किया ही था। इस विवाद में मीडिया के लिए एक सीख भी है। हमार जसे देश में जहां हर क्षेत्र की अलग भाषा और अलग संस्कृति है, वहां हर क्षेत्र की भाषा और संस्कृति को पूरी संवेदनशीलता, जानकारी और समझ के साथ देखा ही जाना चाहिए। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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