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बहुत मशक्कत करनी पड़ी गहलोत को

हमने कहा नहीं था की गर्वित मुद्रा के साथ अशोक गहलोत के एक पारिवारिक मित्र ने उनके मुख्यमंत्री बनने की सूचना देते हुए खुशी तो दिखाई लेकिन उसमें राहत के भाव कहीं अधिक थे। वह जानते थे कि यह खुशी कितनी जद्दोहद के बाद हासिल हुई है। कांग्रेस महासचिव और नेता का चुनाव करने के लिये भेजे गए आलाकमान के पर्यवेक्षक दिग्विजय सिंह ने गहलोत को सर्वसम्म्ति से चुनाव नेता बताया लेकिन उनकी बगल में बैठे प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी के चेहर की फीकी रहस्यमयी मुस्कान साफ बता रही थी कि कुछ स्वर विरोधाभास के भी थे। यह अलग बात है कि गुप्त मतदान में गहलोत के समर्थन में डाली विधायकों की पर्चियों के ढेर में उनके प्रतिद्वन्द्वियों के दावे दबकर रह गए। गहलोत समर्थक विधायकों ने बताया कि उनके पक्ष में 80 विधायक थे। पर्यवेक्षकों के खासाकोठी होटल पहुंचने के साथ ही तीन दिन से जोड़-तोड़ की रणनीति खुल कर सामने आ गई थी। हालांकि जब एक रात पहले जाट नेता परसराम मदेरणा की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जोशी से मुलाकात हुई तो यह संकेत थी कि जाट लॉबी अपनी हार मान चुकी है लेकिन गहलोत को रोकने के लिए विरोधी खेमे में माने जाने वाले जोशी को आगे किया है। लेकिन जाट नेता शीशराम ओला के समर्थक हार मानने को तैयार नहीं थे। पूर होटल परिसर में ओला समर्थक नारबाजी करते रहे। इससे गहलोत समर्थक भी जोश में आ गए और नारबाजी की जंग एकबारगी हाथापाई तक पहुंच गई। दोपहर बाद युद्ध का मैदान प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय हो गया। यहां सड॥क के दोनों तरफ ओला एवं मदेरणा समर्थक थे तो गहलोत समर्थकों ने सामने की इमारत पर मोर्चा सम्भाला। उधर, पर्यवेक्षकों ने नेता का फैसला सोनिया गांधी पर छोड़ने का प्रस्ताव पारित करा लिया। हालांकि दिग्गी राजा ने मदेरणा से मुलाकात की लेकिन बात नहींे बनी और मामला मतदान तक जा पहुंचा। करीब पौने आठ बजे गहलोत विरोधी नेताओं के समर्थकों के मंद पड़ते स्वर और गहलोत समर्थकों की बुलंद होती नारबाजी यह इशारा कर रही थी कि फैसला हो गया है। पर गहलोत के लिए यह राहत क्षणिक है।

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