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भूखे टीवी चैनलों में भुनती खबरंे

मीडिया को मैजिक मल्टीप्लायर की संज्ञा देने वाले संचार अध्ययन के पितामह विल्बर श्राम ने मुंबई की आतंकी घटना का सजीव प्रसारण देखा होता तो यकीनन मीडिया को टेरर मल्टीप्लायर ही कहा होता। टेलीविजन ने मुंबई की आतंकी घटना के फुटेज के साथ सनसनी से सनी स्क्रिप्ट दोहराकर घटना के बाद भी दहशत बरपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। श्राम ने साठ के दशक में मास मीडिया एंड नेशनल डेवलपमेंट नामक किताब में लिखा कि सामाजिक बदलाव के लिए सूचना देने, शिक्षित व प्रेरित करने के लिए मीडिया की चमत्कारिक शक्ति का कमाल देखा जा सकेगा। लेकिन कमाल तो यह है कि सन् 1ेविकास के लक्ष्य की बुनियाद पर खड़ा हुआ भारतीय टेलीविजन निजी हाथों में जाकर सारे लक्ष्य दरकिनार कर सिर्फ लोगों को भ्रमित और भयभीत करने का धर्म निभाता नजर आ रहा है। आतंकी हमलां क दौरान मीडिया की तत्परता न मुंबई और दशवासियां का सतर्क जरूर किया लकिन जैस जैस वक्त बीतता गया मीडिया अपना असल चरित्र दिखाता नजर आया। इस समय खबर का भूखा दर्शक सब्र रखना चाहता था और टीआरपी क भूख खबरिया चैनल खबरां का भूनकर उसमं दर्शक का बांध रखना। इस मीडिया युक्ति का प्रमाण मिला 2नवंबर का। इस दिन निकल साप्ताहिक टलीविजन आडियन्स मजरमन्ट डटा न साबित कर दिया कि चौबीस घंटां क खबरिया चैनलां की दर्शक संख्या उस हफ्त 180 फीसदी पहुंच गई। लाइव प्रसारण का ही चमत्कार था कि दर्शक टस स मस नहीं हुआ और दानां आर की लड़ाई का साक्षी बनकर व्यथित हाता रहा। पर गाली और धमाकां वाल विजुअल्स का दखकर य सवाल उन सभी दर्शकां क मन मं जरूर कौंधा हागा कि आखिर बचाव क लिए हा रही कार्रवाई की लाइव कवरेज का फायदा आधुनिकतम तकनीक स लैस आतंकी भी ता उठा रह हांग। अतिउत्साही मीडिया की इस बचकानी हरकत का सबब पूछा ता एक नामी चैनल क वरिष्ठ रिपार्टर न यह सवाल सिरे स खारिज कर दिया। मुंबई हमल की लगातार तीस घंट की कवरेज द चुक इस रिपार्टर साथी का यह सवाल ही बतुका लगा कि अन्दर बैठ आतंकियां का टलीविजन पर दिखाई कमांडा कार्रवाई क लाइव प्रसारण स कुछ मदद मिली हागी। लकिन यह साच बबुनियाद कतई नहीं थी क्यांकि हफ्त भर मं ही वायुसना प्रमुख एडमिरल सुरेश महता का नाराजगी भरा बयान आया कि जहां दुनिया भर का मीडिया सशक्त करन वाल उपकरण की भूमिका निभाता है वहीं हमारा मीडिया निशक्त करन मं माहिर है। उन्हांन इशारा किया कि मीडिया की पल पल की लाइव कवरेज का असर बचाव आपरेशन पर पड़ा। इसी अहसास स पीड़ित सूचना और प्रसारण मंत्रालय न भी 4 दिसंबर का बिगड़ैल मीडिया स अपील की कि वह विजुअल दाहराकर आतंक क नासूर गहरे न करे। उनकी साच जिनक परिवार उजड़ गए। अब मीडिया वालां की दुविधा यह है कि वह आतंकी हमल मं मारे गए और घायल दा सैंकड़ा लागां और उनक परिवार वालां की पीड़ा की परवाह करे या फिर अपनी टीआरपी की। इसीलिए हम अब तक भी लगातार उन फुटज का कौंधत दख रह हैं। इस दहशत भरे माहौल मं बचारा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी उतना ही बबस लगा जितना आज दश की जनता इस व्यवस्था क सामन महसूस करती है। उसकी धौंस दूरदर्शन पर ता चल जाती है जा पहल ही संहिता और दायरां की बड़ियां मं जकड़ा हुआ लाचार है। इसीलिए मंत्रालय की गुजारिश ता दा सौ निजी चैनलां का चलान वाल 42 प्रसारकां स थी। यही मंत्रालय चैनलां पर लगाम लगान क लिए बरसां स प्रसारण बिल लान की बात कर रहा है। पर मीडिया की लॉबी क सामन हमशा लाचार साबित हुआ। मीडिया वाल प्रस की आजादी क बहान इस बिल का विराध करत रह हैं। कहत हैं हम आत्मसंयम बरतंग। अभी नवंबर क आखिरी हफ्त की ही बात है दूरदर्शन का नियंत्रित करन वाल प्रसार भारती सहित दा सौ निजी टलीविजन चैनलां क संगठन इंडियन ब्राडकास्टिंग फडरेशन न आचार संहिता का मजमून पश किया है। उधर सुप्रीम कार्ट न भी सरकार स इस खाक क आधार पर चार हफ्तां मं टलिविजन सामग्री क लिए आचार संहिता बनान की हिदायत दी है। कार्यक्रमां की सामग्री की बजाय संहिता का पहल खबरां की खबर लनी चाहिए। सूचना प्रसारण मंत्रालय न टीवी चैनलां का दी सलाह मीडिया कवरेज स हा रह चौतरफा नुकसान की आर इशारा करती है। संस्कारित मीडिया हाता ता आत्मसंयम की बात उठन स पहल ही आत्ममंथन करता। आतंकियां क साक्षात्कार को लाइव दिखाकर उनका पक्ष ता दुनिया क सामन रख दिया लकिन एस समय मं व्यवस्था का कासन की बजाय दश का पक्ष भी दुनिया क सामन रखता ता मीडिया पर भी भरासा कायम रहता। सूचनाआं की भूख मिटान की बजाय खुद खबरां का भूखा मीडिया भला किस तरह लाकतंत्र की मदद कर पाएगा। ड्ढr लखिका माइंडपूल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मीडिया, जयपुर की प्रमुख हैं।

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