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भटकती महिला मनोरोगियों का पुनर्वास करती है मान

मीता, लूसिया, जायेदा, स्वाति इन दिनों रांची में हैं। उन्हें मैसूर से रांची लाया गया है। अब एक-एक कर उन्हें उनके घर पहुंचाया जा रहा है। इन्हें गुमशुदगी की अंधेरी दुनिया से लौटा लाया है मैसूर की संस्था मानसा ने।ड्ढr मीता को याद नहीं कि उसके 14 महीने कहां और कैसे कटे। गढ़वा रलवे स्टेशन पर कोयला आदि ढ़ोने का काम करती थी। एक दिन सामान लेकर ट्रेन में चढ़ी थी कि ट्रेन खुल गयी। उतर नहीं पायी। फिर तो, इस ट्रेन से उस ट्रेन तक भटकती रही। बेबसी और जमाने के जुल्म ने शारीरिक ही नहीं मानसिक तौर पर भी तोड़ दिया। याददाश्त लौटी मैसूर की संस्था मानसा के आश्रय में। लेकिन तबतक देर हो चुकी थी। उसे पता ही नहीं कि कब से उसकी कोख में एक और जान पल रहा था। मानसा पहुंचने के तीन दिन बाद ही उसने एक बच्ची को जन्म दिया। संस्थावालों ने नाम रखा है मानसी। अब मीता को उसके घर, गढ़वा पहुंचाने के लिये रांची लाया गया है।ड्ढr बीरमित्रापुर (उड़ीसा) की लूसिया पिछले मार्च से मैसूर में भटक रही थी। देहात की यह युवती शहर देखना चाहती थी। जायेदा औरंगाबाद की है। झारखंड की स्वाति भी एकबार बीमार अवस्था में घर से निकली थी। राउरकेला होते हुए पता नहीं कब मैसूर पहुंच गयी। वह तो मानसा छोड़कर घर लौटना ही नहीं चाहती थी। मैसूर की संस्था मानसा भटकी हुई मानसिक रोगी महिलाओं का इलाज करती है और उनका पुनर्वास भी। रांची में उसको महिला हेप्पलाइन की दिव्या सहयोग कर रही है। (चारों महिलाओं के नाम काल्पनिक हैं।)ड्ढr (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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  • Web Title: भटकती महिला मनोरोगियों का पुनर्वास करती है मान