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आतंकी राजनीति और जनता का जोशो-चाुनून

पिछले दिसम्बर में भारत के मीडिया पर पाकिस्तान छाया हुआ था। वहाँ चुनाव का माहौल था। लगता था अंतत: एक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम होगी और उससे न सिर्फ आतंक पर लगाम लगेगी, भारत-पाकिस्तान रिश्ते भी सुधरंगे। अचानक 27 दिसम्बर को बेनाीर भुट्टो की हत्या हो गई। चुनाव स्थगित हो गए। लोकतंत्र के पैर ठिठक गए। एक छोटे संधिकाल के बाद चुनाव कार्यक्रम घोषित हुआ, चुनाव हुए और सरकार कायम हुई। पिछले आठ-नौ महीनों से पाकिस्तान का एक ओर आतंकवाद और दूसरी ओर आर्थिक संकटों से सामना है। बेनाीर की हत्या के बाद नए साल पर इकोनॉमिस्ट की पहली कवर स्टोरी का शीर्षक था ‘पाकिस्तान--द वर्ल्डस मोस्ट डोंरस प्लेस’ साल बीतते-बीतते यह बात शिद्दत के साथ उभर कर सामने आई है। इधर अचानक दुनिया आर्थिक संकटों से घिरी है। सिविल सोसायटी का ध्यान दूसरी ओर है। एसे में मध्ययुगीन कट्टरपंथी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिल रहा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान हमार पड़ोसी हैं। यह इलाका खतरनाक खेलों का मैदान बना जा रहा है। हम असहाय होकर इसे देख रहे हैं और वक्त-बेवक्त इसकी राजनीति में शामिल हो रहे हैं। अमर्त्य सेन मानते हैं कि व्यवस्था लोकतांत्रिक हो तो दुर्भिक्ष नहीं आते। क्या जम्हूरी निााम आतंकवाद से लड़ सकते हैं और आपसी युद्धों को टाल सकते हैं? भारत-पाकिस्तान दोनों लोकतांत्रिक देश हैं। इनके आपसी रिश्तों के मद्देनार देखें तो लगेगा कि लोकतांत्रिक खुलापन मसलों को भड़काने का मौका भी देता है। मुम्बई धमाकों के बाद भाजपा ने भड़काऊ विज्ञापन देकर त्रासदी को राजनैतिक रंग देने की कोशिश की। क्या यह गलत था? चुनाव न होते तो उस विज्ञापन कीोरूरत नहीं थी। पार्टी का पहला धर्म तो वोट पाना है। उसका तरीका भी नैतिक होगा, यह कौन मानता है? अनीति को नीति साबित करना राजनेता के बाएं हाथ का खेल है। कुछ लोग इसी कौशल को राजनीति मानते हैं। इसमें भाजपा अकेलीोिम्मेदार नहीं। कांग्रेस भी ऐसे काम कर चुकी है। बहरहाल वोटर ने मुम्बई की खूंरÊाी को सरकारी विफलता के बजाय देश पर हमला माना। इस संदेश को भाजपा ने फौरन ग्रहण किया। पिछले गुरुवार को लोकसभा में पक्ष-विपक्ष ने जिस तरह एकता का परिचय दिया, वह भी कम दिखाई पड़ता है। एसे भावनात्मक मौके पर यह हो गया, पर यह राजनीति की फितरत नहीं। और देश की अपेक्षाकृत खाती-पीती जनता ने जिस तरह मोमबत्तियाँ लेकर अपनी जागरूकता का परिचय दिया, वह भी उसकी फितरत नहीं। सरहद के उस पार शक्ल और भी खराब है। मुम्बई में पकड़े गए अजमल कसाब को आज भीोरदारी साहब पाकिस्तानी नहीं मानते। मानते भी हों तो शायद इसे सार्वजनिक रूप से कह पाने का साहस नहीं रखते। मीडिया कवरा में भी असंतुलन है। दोनों ओर स्वाभाविक देशभक्ित का जज़्बा है। मीडिया का स्वतंत्र प्रवाह न होने के कारण दोनों ओर गलत फहमियाँ हैं। फिर भी पाकिस्तान के डॉन, डेली टाइम्स और फ्राइडे टाइम्स वगैरह के नेट संस्करणों को देखकर पाकिस्तान की सिविल सोसायटी पर भरोसा बढ़ता है। वहां की राजनीति कट्टरपंथ और आधुनिक विकास के बीच फँसी है। आधुनिकता की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर ही कट्टरपंथी ताकतें बढ़ी हैं। ारदारी सरकार आतंकी प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करना भी चाहेगी तो क्या वह सफल होगी? इस इलाके की समस्याएं शीत युद्ध की देन हैं। इसमें अमेरिका की बड़ी भूमिका है। इसलिए समाधान में भी उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। भारत-पाक सहयोग कायम करना भीोरूरी है। और यह समझना भी कि आतंकी समस्या, अल कायदा और वैश्विक मुस्लिम दृष्टि क्या है। मूलत: यह राजनैतिक प्रश्न है। पाकिस्तान में सेना लम्बे अर्से से राजनैतिक भूमिका निभा रही है। सेना की संरचना राजनैतिक दलों से भिन्न होती है और उसकी भाषा भी अलग होती है, इसलिए उसके साथ संवाद भी अलग ढंग से हो पाता है। पाकिस्तानी व्यवस्था का विकास जिस तरह हुआ है, उसे देखकर हमें हँसी आएगी, पर उसे नकार नहीं सकते। वहाँ बिजली की मीटर रीडिंग फौाी जवान करता है तभी काम होता है। सेना गवर्न करती है। उसमें भ्रष्टाचार भी वैसा है जसा हमारी राजनीति में है। वहां कोर कमांडर को करोड़ कमांडर कहा जाता है। पाकिस्तानी सेना के खुफिया संगठन आईएसआई को लेकर भी जरूरत से ज्यादा रहस्य है। उसकी वजह भी पाकिस्तानी समाज है, जहाँ धार्मिक सत्ता राज सत्ता का महत्वपूर्ण उपकरण है। पाकिस्तानी राज सत्ता ने कश्मीर और अफगानिस्तान के अभियान धार्मिकोनून के साथ चलाए। अब वह उससे खुद दूर होना चाहे तो कैसे मुमकिन है? वहाँ सेना, इस्लाम और अमेरिका के बाद राजनीति का नम्बर आता है। यह देश किस लक्ष्य को लेकर बना था? कुंठा इसके मूल में है। बांग्लादेश के अलग होने और पेट्रो डॉलर का उदय-काल लगभग एक है। इस दौर में, खासतौर सेोिया-उल-हक के काल में पाकिस्तानी समाज में कट्टरपंथ ने संस्था की शक्ल ली। लश्कर-तैयबा और जशे-मुहम्मद जसी अवधारणाएं इसी दौर में पनपीं। इन सार संगठनों के आदि पुरुष सीआईए की देन हैं। अल कायदा भी। अमेरिका में हुए नाइन इलेवन तक सब सामान्य था। उसके बाद जब परवे मुशर्रफ ने पलटी खाई तब कट्टरपंथी ताकतों की आँखें खुलीं। दिसम्बर 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद परवे मुशर्रफ ने पाँच आतंकी संगठनों पर पाबंदी लगाई तब विरोध शुरू हुआ। उसके पहले मुशर्रफ सबके प्यार थे। उन्होंने भी लश्कर पर दिखावटी कार्रवाई की थी। जमातुद्दावा के रूप में लश्कर के धर्मादा संगठन ने अक्तूबर 2005 में आए भूकम्प के दौरान जनता की जबर्दस्त सेवा कर लोकप्रियता हासिल की। नाकारा सरकार के पास जनता तक पहुँचने तक की ताकत नहीं थी। उधर कश्मीर के बाबत पाकिस्तानी प्रतिष्ठान जनता के मन में इतनी आग भर चुका था कि उसे वापस लेने की सामथ्र्य उसमें नहीं थी। लश्कर के साप्ताहिक अखबार का प्रिंट ऑर्डर लाख के ऊपर था। पाकिस्तान ने हाल में जो भी कदम उठाए हैं, उन्हें लेकर भारत के लोग आश्वस्त नहीं हैं। जिस तरह हाफिा सईद या उनके सहयोगी मीडिया के सामने पेश हो रहे हैं, उससे वे अपराधी जसे नहीं लगते। और जब तक पाकिस्तानी जनता उन्हें अपराधी नहीं मानती तब तक आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की लड़ाई निर्थक है। तालिबान का उदय एक प्रक्रिया की तार्किक परिणति है। उसमें बेनाीर भुट्टो और नवाज शरीफ दोनों ने एक ही तरह का काम किया था। कथनी-करनी का फर्क यानी पाखंड भारत और पाकिस्तान दोनों की राजनीति का केन्द्रीय गुण है। यह जनता के अज्ञानी और कमाोर होने की निशानी है। एसा खोखला लोकतंत्र ही आतंकवाद का पोषण करता है। लेखक हिन्दुस्तान दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।

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