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दो टूक

नक्सलियों का तांडव, निष्क्रिय सरकार, दुबका प्रशासन और सहमी जनता। क्या यही है झारखंड की नियति? विधायक का घर लूटा, उड़ा दिया। नक्सलियों की धमकी से अंतरराष्ट्रीय जन तीर्थ स्थल का शिखर महोत्सव टल गया। नक्सली हत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा। आये दिन हिंसा और हत्या। सूबे में किसका शासन चल रहा है, कोई तो बताये? क्या नक्सलियों के आगे पुलिस और प्रशासन ने हथियार डाल दिये हैं? खद्दरधारी शासक और खाकी वरदीधारी रक्षक किस मर्ज की दवा हैं। पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं ये। निरीह और बेचारी जनता का क्या कुसूर? कब तक मर-मर कर जीती रहेगी वह। सहने की भी हद होती है। सब्र की अब और परीक्षा न लीजिये, वरना सब्र का बांध टूटा तो संभालना मुश्किल हो जायेगा।

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