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जागो रे ..

शरीर के लिए नींद आवश्यक है। थकान मिट जाती है। मन भी स्फूर्ति पाता है। नींद में शरीर और मन को ताजा रखन की शक्ित है। सारा शरीर शिथिल हो जाता है। विद्वानों ने जीवन और मृत्यु की भी तुलना जागृतावस्था और सुसुप्तावस्था स की है। सारा शरीर निष्क्रिय हो जाता है। सो जाता है। पर सांस चलती रहती है। प्राण जगा रहता है। यह सांस ही तो ईश्वरीय अंश है। वेदांत में कहा गया है- ‘एषु सुप्तेषु जागर्ति’ अर्थात जब सारी प्रकृति और सृष्टि सो जाती है तो ईश्वर जगा रहता है। प्राण भी ईश्वर का अंश है। इसलिए सभी इन्द्रियों के सो जाने पर भी प्राण जगा रहता है। भोर का बड़ा महत्व है। सुबह, दिन, शाम और रात्रि से भी अधिक। शायद इसलिए कि वह सारे जीवों के जागन का समय है। इसे ब्रह्ममुहूर्त भी कहते हैं। विद्वानों न कलाओं की साधकों के लिए भोर में ही जगन का विधान बनाया है। सूर्योदय से पूर्व। जब सारे पशु-पक्षी जाग जाते हैं- ‘जागहु रघुनाथ कुँअर, वन के पंक्षी सब बोलन लागे।’ ईश्वर तो सोता ही नहीं। उसकी जाग्रतावस्था ही है। इसलिए भी मनुष्य के जाग्रतावस्था का महत्व है। इसलिए कहा गया है- ‘उष्तिष्ठत् जाग्रत, प्राप्यावरानिबोधत।’ उठो, जागो और ज्ञान प्राप्त करो। उठो, जागो, जानो। जीवन का लक्ष्य श्रेष्ठ वस्तु को जानन का प्रयास ही है। यह कार्य सुसुप्तावस्था में संभव नहीं। इसलिए ‘जागते रहो’ का संदेश है। इस जागन का अभिप्राय नींद के खुलन का नहीं, वरन अंदर से जागृति। जानन की जीजिविषा के साथ जागना। चैतन्य होना। जीवन में छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी जागते रहने से हो जाता है। यह तब संभव है, जब विद्वानों की संगति में जाकर ज्ञान प्राप्त किया जाता है। श्रेष्ठ पुरुष ही कल्याण का मार्ग बताते हैं। पर सोए हुए व्यक्ित (अचेतन में रहने वाले) को इसका अंदाज नहीं लगता। इसलिए ज्ञान प्राप्त करन के पूर्व जगना आवश्यक है। यानी कि सचेत होना।

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