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आतंक का अर्थशास्त्र

अत्याधुनिक हथियार, सैटेलाइट फोन और आधुनिक तकनीक से लैस से लड़ाई सिर्फ सुरक्षा बलों के भरोसे ही नहीं लड़ी जा सकती। दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कई स्तरों पर और लगतार चल रही है। इस जंग के पीछे की सोच यह है कि उन सभी रास्तों को बंद कर दो जहां से आतंकवादी अपने लिए हवा-पानी और बारूद हासिल करते हैं। 11 सिंतबर की घटना के बाद अमेरिका ने इसके लिए एक बड़ा कार्यक्रम चलाया था- टैररिस्ट फाइनेंस ट्रैकिंग प्रोग्राम। इसके लिए दुनिया भर में उन स्रेतों का पता लगाया गया, जहां से आतंकवादी धन हासिल करते हैं, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजते हैं, आतंक का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करते हैं और फिर वारदात को अंजाम देते हैं। इसके बाद हुई कोशिशों ने दुनिया भर में उनके खातों को सील करने और फाइनेंस के रास्तों पर रोक लगाने का काम किया। इसका असर भी पड़ा, लेकिन बहुत बड़ा असर नहीं। आतंकी संगठनों और खाताधारियों ने अपने नाम और ठिकाने बदल दिए। तबसे यह चूहा-बिल्ली की लड़ाई लगातार चल रही है। अब, जब हमार रिार्व बैंक ने ऐसे 400 खातों का पता लगाया है, जिन पर आतंक को फाइनेंस करने की आश्ांका है तो अमेरिका के इस उदाहरण को ध्यान में रखना जरूरी है। यह उदाहरण बताता है कि आतंकियों के खातों का पता लगाना और उन्हें सील करना एक शुरुआत भर हो सकती है, लेकिन आतंकवाद की कमर तोड़ने की लड़ाई लंबी है और इसे सतत चलाना होगा। भारत में यह लड़ाई और भी मुश्किल है, क्योंकि हमार यहां काले धन की अर्थव्यवस्था ज्यादा बड़ी है और ज्यादा प्रभावशाली भी। यह ठीक है कि आतंक को फाइनेंस करने की रकम का एक बड़ा हिस्सा विदेश से ही आता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर आतंकवादी घरलू संसाधनों से भी पैसा बटोर सकते हैं। मुंबई के माफिया का धन किस तरह आतंकवादी वारदात में इस्तेमाल हो चुका है यह सभी जानते हैं। और जब हम काले धन की बात करते हैं तो उस साधन की बात करते हैं जिसका ज्यादा बड़ा हिस्सा हमारी बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंचता भी नहीं है। अमेरिका में भी जांच इसी नतीजे पर पहुंची थी कि आतंकियों को पैसा बैंकिंग व्यवस्था से ज्यादा हवाला व्यवस्था से मिलता है। आतंकवाद को जीतने के लिए कालेधन को हराना सबसे जरूरी है।

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  • Web Title: आतंक का अर्थशास्त्र