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अब तो आकाश भी साथ नहीं दे रहा

जिंदगी पटरी पर नहीं लौट रही है। बाढ़पीड़ित अब भी जिंदगी बस किसी तरह समेटने में लगे हैं। अब तो सरकार के साथ-साथ स्वयंसेवी संगठनों ने भी बोरिया-बिस्तर समेट लिया है। सच्चाई यह है कि अब भी हाारों लोग गांव तक नहीं पहुंच पाए हैं। गांव की सड़कें कई नदियों में बदल चुकी हैं। अब तक आकाश साथ देता था। अब वह भी कष्ट देने लगा है। शीत भरी ठिठुरती रातें अब नया कष्ट दे रही हैं। अब कौन सी राहत आएगी इसका इंतजार है।ड्ढr ड्ढr शासन के रािस्टर में अलाव जलाने लायक ठंड अभी नहीं आई है। किसी एनजीओ को अलाव जलाने की याद नहीं आई। राहत के वक्त में कुछ कंबल बंटे थे, जिन्हें मिल गए वे उसके सहार ठंड से लड़ रहे हैं। ज्यादातर कंबल के लिए राह तक रहे हैं। सच यही है कि क्षेत्र में मौजूद लाखों लोगों की जिंदगी उन्हीं पर बोझ बन गई है। न खाने को अन्न है, न रहने को घर और न ही पहनने को वस्त्र, फिर भी जीने का संघर्ष जारी है। ठीक चार माह पहले 18 अगस्त को नेपाल के कुसहा में तटबंध टूटने के बाद एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ। काफी शोर मचा लेकिन जलस्तर घटने के साथ-साथ अब सब कुछ खामोश होता चला गया। सेना कब का लौट चुकी है, स्वयंसेवी संगठन भी अपना डेरा-डंडा समेट चुके हैं। सब अपनी पीठ थपथपाने में जुटे हैं जबकि बाढ़पीड़ित अब भी अपनी बिखरी जिंदगी को समेटने में ही जुटे हैं। वे अब भी चारों ओर से पानी में घिर हैं। कई धाराओं का रूप ले चुके पानी ने अब भी बस्तियों को चारों ओर से घेर रखा है। आवागमन बहाल नहीं हो पाया है।ड्ढr ड्ढr छातापुर प्रखंड के झखाड़गढ़, लालपुर-तिलाठी, उधमपुर, जीवछपुर, मधुबनी, चैनपुर, ढुढी, बलुआ, करहवाना, डहरिया तथा त्रिवेणीगंज प्रखंड के मानगंज, पिलुवाहा, जदिया, कोरियापट्टी, औरलाहा पंचायत के हाारों लोग अब भी गांव नहीं लौट पाये हैं। पूर क्षेत्र के हाारों मकानों का अस्तित्व मिट चुका है। जो बचे हैं, महीनों रहे जलजमाव ने उनकी नींव हिला दी है। वे खतरनाक हो चुके हैं। लोग सड़कों पर तंबू तथा छत्तियां डाल रह रहे हैं। जो चापाकल महीनों पानी में डूबे रहे उसका पानी पीने को मजबूर हैं।

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