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भिखारी नहीं हैं आदिवासी स्टेन स्वामी

उद्योगपतियों के लालच की कोई सीमा होनी चाहिए। वे अपनी कंपनी के वार्षिक मुनाफे काीसदी हिस्सा खुद लेना चाहते हैं और सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही उस आदिवासी जमीन मालिक को देना चाहते हैं, जिसकी जमीन में खनिज संसाधन मौजूद है। यह ऐसा है जसे कोई धनी व्यक्ित किसी भिखारी की ओर दस पैसे का सिक्का उछाल रहा हो।ड्ढr इस मामले में विडंबना यह है कि खनिज संसाधन उस आदिवासी की जमीन में है। इसे प्रकृति ने उसे दिया है और इसलिए वह उस जमीन के ऊपर और नीचे की संपदा का मालिक है। पूंजीवादी कानून राज्य को खनिज संसाधनों का मालिक बनाता है। यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है और प्रकृति का कानून राज्य के किसी भी कानून से ऊपर है। ठीक इसी तरह अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के मूल निवासियों को जमीन पर उनके वाजिब हक से वंचित किया गया और उपनिवेशी काल में उन्हें जबरन सुदूर हिस्सों में भेज दिया गया। यदि बेदखली की यह प्रक्रिया जारी रही, तो देश के आदिवासियों के पास कहीं और जाने की जगह नहीं बचेगी। वे विलुप्त हो जायेंगे।ड्ढr खनिज के मूल्य पर आदिवासी जमीन मालिक का हक : आइये औद्योगिक लूट का एक ठोस नमूना देखें। यह उदाहरण झारखंड के संथाल परगना का है। वर्ष 1में जियोलॉजिकल सव्रे ऑफ इंडिया द्वारा पछुआरा क्षेत्र में कोयले की खोज शुरू की गयी। पछुआरा के 1300 हेक्टेयर क्षेत्र में 562 मिलियन टन कोयले की मौजूदगी की बात कही गयी है। पछुआरा कोल ब्लॉक संथाल परगना के पाकुड़ जिले में है। झारखंड सरकार ने एक निजी खनन कंपनी, पैनम को कोयले के खनन के लिए नौ संथाल आदिवासी गांव में फैले 1300 हेक्टेयर क्षेत्र लीज में दी है। पैनम द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 1300 हेक्टेयर क्षेत्र से 562 मिलियन टन कोयला निकाला जायेगा। इस कोयले की कीमत का अंदाजा 562 मिलियन टन कोयले की वर्तमान कीमत को 1300 हेक्टेयर से भाग देकर लगाया जा सकता है। इसका 50 फीसदी हिस्सा जमीन के मालिक को अवश्य मिलना चाहिए।ड्ढr

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