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बढ़ते ठंड के साथ बीमारियों का बढ़ता प्रकोप

देश में तापमान जितनी तेजी से गिरता जा रहा है उतनी ही तेजी से सर्दी, जुकाम, फ्लू, निमोनिया और दिल के दौरे जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। बढ़ती ठंड के कारण अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), मैक्स हॉस्पीटल और मेट्रो हॉस्पीटल्स एण्ड हार्ट इंस्टीटूट जैसे दिल्ली और अन्य शहरों के अस्पतालों में इन बीमारियों के मरीजों का आना तेज हो गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि जाड़े में दिल की हिफाजत करने का सबसे अच्छा तरीका शरीर को गर्म रखना, अधिक समय तक ठंड के संपर्क मे ंरहने से बचना और खुली जगह में शारीरिक श्रम करने से परहेज करना है। इसके अलावा शराब, मादक पदाथर्ों, अधिक वसा वाले भोजन तथा मिठाइयों से भी बचना चाहिए। एम्स के प्रोफेसर रंदीप गुलेरिया के अनुसार पिछले महीने के अंत से यहां 10-15 प्रतिशत रोगी बुखार, सर्दी, जुकाम, दर्द और इंफ्लुएंजा जैसे लक्षणों वाले आ रहे हैं। नोएडा स्थित मेट्रो हॉस्पीट्ल्स एंड हार्ट इंस्टीच्यूट के निदेशक डा. लाल ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से छाती में दर्द अथवा भारीपन और सांस लेने में दिक्कत जैसी शिकायतें लेकर उनके अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या में15 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा आदि रायों में कार्यरत मेर्टो ग्रुप आफ हॉस्पीटल्स के चैयरमैन डॉ. पुरुषोत्तम लाल के अनुसार ठंड के कारण उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों मंे ंदिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी बढ़ जाता है। क्रिसमस से लेकर जनवरी तक का समय हृदय रोगियों के लिए सबसे अधिक घातक होता है। इन महीनों में अधिक खाना, शराब का अधिक सेवन और अधिक तनाव ह्दय रोगों को आमंत्रण देता है। इंद्र प्रस्थ अपोलो हॉस्पीटल के रेसपाइरेटरी एंड क्रिटिकल केयर के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. राजेश चावला कहते हैं कि हर साल हम लोग सामान्य मौसम के मुकाबले ठंडके मौसम में तीन गुना अधिक फ्लू के मामले देखते हैं। मैक्स हॉस्पीटल के पल्मोनरी विभाग में सीनियर कंसल्टेंट डा. नवीन किशोर कहते हैं कि तापमान कम होने और आद्र्रता के कारण फ्लू के वायरस अधिक आसानी से फैल रहे हैं। इसलिए इंफ्लुएंजा के मामलों में 15-20 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है। डा. लाल के अनुसार हृदय रोगों का ठंडे मौसम से गहरा संबंध है। ठंडा मौसम हृदय और रक्त संचार को कई तरह से प्रभावित करता है। इस मौसम में रक्त गाढ़ा हो जाता है और उसमें लसीलापन बढ़ जाता है, रक्त की पतली नलिकाएं संकरी हो जाती है, रक्त का दबाव बढ़ जाता है और हृदय की धड़नक बढ़ जाती है। धमनियों की लाइनिंग अस्थाई रुप से क्लाट यानी थ्क्के के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है। इनके कारण ह्दय को अधिक कार्य करना पड़ता है और अधिक ठंड पड़ने या ठंडे मौसम के अधिक समय तक रहने पर खासकर उच्च रक्त चाप से पीड़ित लोगों में स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है। डा. लाल बताते हैं कि सर्दियों में श्वसन संबंधी बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ जाता है, जिसका हृदय पर भी प्रभाव पड़ता है। इस मौसम में हृदय रोग होने के अन्य कारण भी हैं। छुट्टियों मे ंलोग अधिक और विशेष आहार लेते हैं, शराब का अधिक सेवन करते हैं ,उच्च रक्तचाप और रक्त को पतला करने वाली इवाइयों एवं अन्य जरुरी दवाइयों का सेवन करने से बचते हैं और परिवार और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने के दौरान दिल के दौरे के लक्षण को गंभीरता से नहीं लेते हैं। छाती के दर्द को लोग आम तौर पर अपच या गैस का दर्द समझ लेते हैं और चिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं। सर्दियों मे ंअस्पतालों में डॉक्टरों और नसर्ों की आम तौर पर कमी रहती है, जिसके कारण दिल के दौरे की पहचान में अधिक समय लगता है और रोगी के बंद हो चुकी धमनियों को साफ करने में देरी हो जाती है। दिल्ली डायबेटिक रिसर्च सेंटर के अनुसार जाड़ों मे ंमधुमेह के मरीजों को दिल के दौरे पड़ने की आशंका अधिक रहती हैं। जाड़ों में काफी लोग अधिक मात्रा में शराब, निकोटिन और मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं। इससे भी शरीर की रोग प्रतिरक्षण क्षमता घटती है और विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त होने के खतरे बढ़ते हैं। डॉ. लाल ने बताया कि जाड़े के दिनों में अधिक ठंड के कारण हृदय के अलावा मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों की धमनियां सिकुड़ती हैं, जिससे रक्त प्रवाह में रुकावट आती है और रक्त के थक्के बनने की आशंका अधिक हो जाती है। ऐसे में न केवल हृदय के बल्कि मस्तिष्क और शरीर के अन्य अगों मंे ंपक्षाघात, स्ट्रोक पड़ने के खतरे अधिक होते हैं। जाड़े के दिनों हाइपोथर्मिया, उच्च रक्त चाप, मघुमेह, दमा तथा दिल के दौरे के कारण हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। सर्दियों में न केवल तेज ठंड से उत्पन्न हाइपोथर्मिया, उच्च रक्तचाप, दिल के दौरे, दमा और मधुमेह के कारण असामयिक मौत की घटनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। देश में हर साल ऐसी मौतों की संख्या लाखों मे ंहोती हैं। अधिक ठंड के कारण फ्लू जैसी बीमारियां निमोनिया और ब्रोंकाइटिस आदि में तब्दील हो सकती हैं। इंद्रप्रस्थ अपोलो हास्पिटल के इंटरनल मेडिसीन में सीनियर कंसल्टेंट डा. राकेश गुप्ता कहते हैं कि जाड़े में फ्लू के प्रकोप से बचने के लिए बेहतर है कि पहले ही टीके लगावा लिए जाएं। इससे आपके शरीर को फ्लू वायरस के प्रति एंटीबाडी विकसित करने के लिए समय मिल जाएगा। भारत में फ्लू के कारणों के प्रति जागरुकता पैदा करने में जुटी स्वयं सेवी संस्था इंफ्लुएंजा फाउंडेशन आफ इंडिया (आईएफआई) के अनुसार फ्लू से बचने का सबसे अच्छा तरीका हर साल फ्लू के टीके लगवान हैं। एडवाइजरी कमेटी आन इम्युनाइजेशन प्रैक्िटसेज (एसीआईपी) ने 50 से अधिक उम्र के लोगों और 5-12 साल के बच्चों के अलावा हृदय रोगों अस्थमा और किडनी के रोग जैसी पुरानी बीमारियों से पीड़ित रोगियों को भी फ्लू के टीके लगाए जाने की सिफारिश की है। डा. लाल के बताते हैं कि जाड़ों मे ंदिल के दौरे पड़ने की आशंका बढ़ने का एक कारण यह भी है कि जाड़ों में श्वसन संबंधी संक्रमण अधिक होते हैं। इन संक्रमणों के कारण रक्त नलिकाआें में सूजन पैदा होती हैं और उनमें होने वाले रक्त प्रवाह में रुकावट आती हैं।ड्ढr ह्दय विशेषज्ञों के अनुसार जाड़ों में दिल के दौरे की आशंका बढने का एक कारण जाड़े के दिनों में शरीर से कम मात्रा में नमक का निकलना है। तापमान कम होने के कारण शरीर से कम पसीना और कम लवण निकलते हैं, लेकिन हम जाड़े के दिनों में भी गर्मियों की तरह ही पर्याप्त मात्रा में नमक लेते हैं। शरीर से कम नमक निकलने के कारण भी रक्त क्लाट बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। शरीर से कम लवण के बाहर आने से सामान्य ह्दय को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचता, लेकिन कमजोर ह्दय वाले लोगों और खास कर उन्हें जिन्हें पहले दिल के दौरे पड चुके होते हैं, दोबारा दिल के दौरे पड़ने के खतरे बढ़ जाते हैं। डॉ. लाल के अनुसार जाड़ों मे ंमांसपेशियों में खिंचाव आता है जिससे रक्त नलिकाएं संकरी हो जाती हैं और हृदय के अलावा शरीर के अन्य अंगों मे ंरक्त आपूर्ति बाधित होती है। इससे रक्त चाप भी बढ़ता है और बढ़ा हुआ रक्त चाप दिल के दौरे की आशंका को बढ़ाता है। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है। यह देखा गया है कि जिन लोगों को रक्त दाब अधिक होते हैं, उन्हें जाड़ों में दिल का दौरा पड़ने का खतरा यादा रहता है।

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