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पर्यावरण की चिंता

पूरी दुनिया पर्यावरण-प्रदूषण के भय से त्रस्त है। यह चिंता नई नहीं है पहले भी थी। तब हमारे मुनियों ने इस विषय पर भी चिन्तन किया था, इसके समाधान भी पेश किए थे। उन्होंने पर्यावरण के हानिकारक प्रत्येक काम को आसुरी प्रवृत्ति और हितकर को दैवी प्रवृत्ति माना है। हमारी अदूरदर्शिता के कारण इस पृथ्वी पर रहने वालों के सामने पर्यावरण प्रदूषण एक विकराल रूप धारण कर रहा है। कुदरत का ऐसा प्रावधान है कि वृक्ष-वनस्पतियां आदि पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनें। यह सब प्राकृतिक सम्पदाएं पर्यावरण के सजग प्रहरी हैं, जो एक आवश्यक भूमिका निभाते हैं। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड आदि हानिकारक गैसों को शोषित कर लेते हैं और सब प्राणियों के लिए जीवनदायक प्राण-वायु (ऑक्सीजन) उपलब्ध कराते हैं। वृक्ष-वनस्पतियां सभी प्राणियों के प्राण हैं। हमारे सभी ब्राह्मण गं्रथों, वेदों, भारतीय दर्शनशास्त्रों में कितने ही ऐसे प्रमाण हैं ‘प्राणों वै वनस्पति’, वन-वनस्पतियों के सुख शांतिदायक और अनुकूल होन की कामना की गई है। वैसे भी भारतीय परम्परा में वटवृक्ष, आम्र, पीपल, तुलसी आदि का नाश सर्वथा निषेध माना गया है। हमारी पवित्र सरिताएं और सरोवर के तटों पर आस्था केन्द्र काशी, मथुरा, हरिद्वार आदि तीर्थ स्थापित हैं। वृक्ष हर प्रकार से पृथ्वी के रक्षक हैं, जो मरुस्थल पर नियंत्रण करते हैं, नदियों की बाढ़ की रोकथाम व जलवायु को स्वच्छ रखते हैं, समय पर वर्षा लाने में सहायक हैं, धरती की उपजाऊ शक्ित को बढ़ाते हैं। वृक्ष हमारा दाता है जो हमें निरन्तर सुख ही देता रहता है। जनता व सरकार का दायित्व बनता है कि अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर वातावरण को दूषित होने से बचाएं। ऐसा करके हम अपना ही नहीं, सर्वजन हितकारी कल्याण का काम करेंगे। हमें वृक्षों व वनों को अपने पुत्रों की भांति पालना व रक्षा करनी चाहिए, वृक्षों का निष्प्रयोजन काटना न हो और हो भी तो उतने या उससे दुगने वृक्ष अवश्य लगाएं। अगर समय रहते नहीं चेते तो दूषित वातावरण हमें और हमारी भावी पीढ़ी के विनाश का कारण बन सकता है।

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