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पुराने तौर-तरीके छोड़ने का वक्त

मुंबई में हुई आतंकवादी वारदात के बाद पूर देश में भय के वातावरण का निर्माण हो गया है, यह हमार लिए सबसे खतरनाक बात है। मुंबई में लोग कहते हैं कि उन्हें रात को नींद नहीं आती है, वे डर रहते हैं, क्योंकि चार दिनों तक उन्होंने टीवी पर लगातार जो देखा है, उसका भारी असर उनके दिलो-दिमाग पर हुआ है। इसलिए आज हमें प्रभावी और कड़े कदमों की आवश्यकता है, जिससे लोगों और नागरिकों में एक विश्वास पैदा हो। सरकार उस विश्वास को देने की कोशिश कर रही है। विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी की आवाज में जो सख्ती है, उन्होंने जिस तरह से बोला है और जिस विश्वास के साथ बोला है, मुझे लगता है कि जरूर कुछ न कुछ ऐसे कदम उठाए जाएंगे, जिनसे पाकिस्तान की सरकार को सबक मिले। अगर पाकिस्तान की सरकार इसे काबू कर पाने में असफल है, तो उनको बाकी लोगों की मदद लेनी चाहिए। उनको भारत सरकार की मदद लेने में शर्म क्यों आती है? अगर वे लोग आतंकवादियों के ठिकानों को ध्वस्त नहीं कर पा रहे हैं, तो हमार कमांडो उन कैंपों को ध्वस्त करने में जरा भी देर नहीं लगाएंगे। हम युद्ध नहीं चाहते हैं, अपनी तरफ से जाने से युद्ध हो जाता है। उन लोगों को कहना चाहिए कि आप हमें सहयोग दीजिए। अगर वे उन आतंकवादियों को नहीं निपटा पा रहे हैं, तो दोनों फोर्सेज मिलकर उनसे निपट सकती हैं। जो आतंकवादी पकड़ा गया है, उसने बताया है कि छह महीनों तक उसकी तीन बार ट्रेनिंग हुई थी, उस ट्रेनिंग के अलग-अलग नाम थे, उनको स्वीमिंग तक सिखाई गई और इंडियन सिक्योरिटी फोर्सेज के बार में पूर 15 दिनों तक ट्रेनिंग दी गई। अगर इंडियन सियोरिटी फोर्सेज के बार में 15 दिनों तक बताने का मसाला उनके पास था, तो निश्चित रूप से किन्हीं एक्सपर्ट ने उनको ट्रेनिंग दी होगी, चाहे आईएसआई के हों, चाहे कोई और। जब मैं आईएसआई का नाम लेता हूं, तो मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि पाकिस्तान में जितनी भी लोकतांत्रिक सरकारं हुई हैं, किसी का भी आईएसआई पर कंट्रोल नहीं रहा है और वे इलेक्टेड प्राइममिनिस्टर या प्रेसीडेंट को कुछ मानते ही नहीं हैं। जब तक जनरल न हो, आईएसआई सुनती नहीं है। यदि कुर्सी पर जनरल बैठा हो, चाहे वह प्रेसीडेंट हो, चाहे प्राइममिनिस्टर हो, सिर्फ उसी की वे सुनते हैं। इसलिए जब हम वहां की सरकार की बात करते हैं, तो आईएसआई और सेना को अलग करके देखना चाहिए। पिछले कुछ समय में जिस तरह की एकता हमार लोगों ने दिखाई है, मेर हिसाब से उसका उदाहरण पूर देश में अभी तक नहीं मिला है। मुंबई में इन घटनाओं के बाद पूरा देश एक हो गया, सार समाज के लोग इकट्ठे हुए, लोगों ने कब्रिस्तान देने से मना कर दिया। फिल्मी दुनिया के लोगों ने बकरीद नहीं मनाई। इसी भावना से हम इस आतंकवाद की लड़ाई को जीतेंगे। उनके जमाने में क्या हुआ, हमार जमाने में क्या हुआ -अभी ऐसी बातें करने का वक्त नहीं है। अरुण शोरी ने कहा कि एनडीए वर्सेज यूपीए। हम यह बिल्कुल नहीं करना चाहते हैं। आज तक कोई सरकार यह दावा नहीं कर सकती है कि उसने आतंकवाद पर काबू पा लिया या उसके जमाने में आतंकवाद की घटनाएं नहीं हुईं। हर पार्टी, हर सरकार के जमाने में आतंकवाद की घटनाएं हुई हैं, इसलिए यह क्लेम करना कि हम आकर हर चीज को रोक देंगे, बिल्कुल भी वाजिब बात नहीं है। तीन-तीन राजनेता इस घटना के बाद शहीद हो गए। माननीय पूर्व गृहमंत्री जी बैठे हैं, इनका इस्तीफा हो गया, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का इस्तीफा हो गया और वहां के गृहमंत्री का इस्तीफा हो गया। थोड़ी सी जिम्मेदारी अफसरों को भी दी जाए। सारी गलती नेताओं की ही नहीं है, अफसरों की भी जिम्मेदारी बनती है। आखिर इंटेलीजेंस फेलिओर कैसे हुआ। यह जिम्मेदारी किसकी बनती है। एनएसजी के चार सेंटर खोलने की बात थी, एक साल तक वह फाइल किस अधिकारी के पास दबी रही। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हमार जो लोग इन आतंकवादियों का मुकाबला करने जा रहे थे, वे जो हेलमेट लगाए हुए थे, वह सेकेंड वर्ल्ड वार के हेलमेट थे और जकेट 1ी थी। इक्िवपमेंट क्यों नहीं खरीदे जा रहे हैं, इतनी सरकारं बीच में आईं और गईं। इक्िवपमेंट अपडेट करने की जिम्मेदारी इन सब सरकारों की बनती थी। ऐसे-ऐसे हेलमेट आ गए हैं कि उनमें नाइट विजन कैमरा है, जो अंधेर में बता दे कि टेरोरिस्ट कहां बैठा हुआ है। हमार एनएसजी के डीाी साहब कह रहे थे कि वहां अंधेरा है, इसलिए समझ में नहीं आता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि टेरोरिस्ट हॉस्टेा को भी पकड़े हुए हो, इसलिए हम एकदम से गोली नहीं छोड़ रहे हैं, क्योंकि हो सकता है उससे हॉस्टेा भी मार जाएं। इक्िवपमेंट खरीदने संबंधी जो-ाो फाइलें, चाहे वह रक्षा मंत्रालय में पड़ी हों, चाहे गृह मंत्रालय में पड़ी हों, उनको प्राथमिकता से क्लीयर कराना चाहिए। इसमें कहीं कोई पार्टीजन- या हम आए हैं तो हमार ऊपर आरोप और आप आएं हैं तो आपके ऊपर आरोप, हर चीज में जो हम आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में पड़ते हैं तो आज सारी राजनीतिक दल इस पर संकल्प कर कि जो देशहित में है, उसमें हम राजनीति फायदा नहीं लेंगे। तभी हमारी सेनाएं, हमारी सेक्यूरिटी एजेंसी, हमारी पुलिस मजबूत होगी। शौरी जी ने एक बात बहुत अच्छी कही कि जो आबादी-पुलिस का रशियो है, वह बहुत कम है और वह बढ़ना चाहिए। वह 200 के ऊपर होना चाहिए। यह कैसे होगा? इसमें राज्य सरकारों की महती भूमिका है। भर्ती का काम राज्य सरकारों को करना है। जो भी एक्सपर्ट एजेंसी हैं, उनमें क्वालिफाइड लोगों को लेना चाहिए, क्योंकि अगर हमार लोगों को यह समझ नहीं है कि जीपीएस सिस्टम कैसे काम करता है, किस तरह से हम ए के-47 का मुकाबला करं। आज इस देश के अस्सी प्रतिशत दारोगा को यह नहीं पता होगा कि गूगल क्या है। आप जो कहते हैं कि उन्होंने गूगल से मैपिंग की थी कि कहां विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन है, तो कैसे पता लगा सकते हैं, इसलिए हर लिहाज से हमें अपनी फोर्सेज को चुस्त-दुरुस्त करना पड़ेगा। आज जिस फेडरल एजेंसी बनाने की बात हो रही है, मुझे सरकार से पूरी-पूरी आशा है कि उस फेडरल एजेंसी में ऐसे एक्सपर्ट लोगों को लिया जाएगा, जो इस चीज काड्ढr मुकाबला बहुत मजबूती से और शिद्दत के साथ कर सकें। लेखक राज्यसभा सदस्य हैं।

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