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बाबू, ठंडी में हाड़ गैल रहल छै

प्रलय के चार माह बाद भी अधिकांश लोग अपने घरों में वापस जाने के बजाय सड़कों के किनार खानाबदोश की जिंदगी गुजारने के लिए विवश हैं। शीतलहर का प्रकोप बढ़ने के साथ ही जीवन जीने का इनका जज्बा हिल रहा है। हाड़कपाती ठंड उन्हें तिल-तिल मरने को विवश कर रही है। यह सच्चाई है मानगंज पश्चिम पंचायत के काहा गांव के 17 महादलित परिवारों के 62 व्यस्कों व 41 बच्चों की, जो पिछले चार माह से त्रिवेणीगंज-ादिया मुख्य मार्ग पर तंबू बनाकर जिंदगी की गाड़ी किसी तरह खींच रहे हैं।ड्ढr ड्ढr मसोमात अमरिका व सुगिया ने कहा कि बाबू ठंडी सिट-सिट कै खोपड़ी में घुसे छै, बिना भोटिया (कम्बल) के हाड़ गैल रहैल छै। भगवानों वैरी भै गले। विधवा द्वय का यह क्रंदन इन्हे मिली राहत की सच्चाई चीख-चीख कर बयां कर रहा है। राजेन्द्र ऋषिदेव व मंगल ऋषिदेव कहते हैं कि सहायता के नाम पर 80 किलो चावल, गेहूं व 2200 रुपये मात्र मुखिया के माध्यम से मिल पाया है। परिवार की गाड़ी खींचने के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरा जसा है। सच्चाई यह है कि इस क्षेत्र के अधिकांश लोग आज तक घर वापस नहीं जा पाये हैं। तीन बच्चों की मां निरो देवी कहती है कि घर जाइके कि करबे, कोसी माई घर गिल लेलकेय। गांव जाने वाली सड़कों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। प्रशासनिक अधिकारी, एनजीओ व नेताओं की गाड़ी प्रतिदिन इन दलित के छपरों पर धूल उड़ाकर चली जाती है, लेकिन शीतलहरी से लोहा ले रहे इनके लिए दो-चार कम्बल एवं आग के वास्ते लकड़ी देने की फुर्सत किसी को नहीं है। इन जसे सैकड़ों परिवारों को न खाने को अन्न है न रहने को एक अदद घर और न ही ठंड से मुकाबले के लिए वस्त्र। सड़कों के किनार महीनों से तंबू व झोपड़ी बनाकर रह रहे इन परिवारों की जिंदगी की डोर कब टूट जाएगी कहना कठिन है।

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