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आंध्र प्रदेश: पुलिस एनकाउंटर पर तेजाबी बहस

पिछले हफ्ते स्वप्निका और प्रणीता आंध्र प्रदेश की उन लड़कियों की सूची में शामिल हो गईं जिनके चेहरे पर तेजाबी हमला हो चुका है। ये वे लड़कियां हैं जो इसलिए शिकार बनी क्योंकि वे छेडख़ानी का विरोध कर रही थीं। जब वारदात हुईं तो इांीनियरिंग की ये दोनों छात्राएं अपने स्कूटर पर कॉलेज से लौट रहीं थीं। अब दोनों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। यह तेजाबी हमला एस. श्रीनिवास ने करवाया था और उसका निशाना थी स्वप्निका। इस राज्य में तेजाबी हमला कोई नई बात नहीं है। हाल के वर्षो में यहां ऐसी कई वारदात हुई हैं। औरतों के खिलाफ इस तरह की बर्बरता के काफी पहले के शिकारों में एक थीं श्रीलक्ष्मी जिनका मामला काफी समय तक सुर्खियों में रहा था। उसे तब शिकार बनाया गया जब कॉलेज में एक सीनियर के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था। और उसे इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। जब वे विजयवाड़ा में परीक्षा दे रहीं थीं तो परीक्षा कक्ष में ही दिनदिहाड़े उनकी हत्या कर दी गई थी। श्रीलक्ष्मी के पहले भी और बाद में भी राज्य में ऐसे कई मामले हुए जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके। अपराधी को पकड़ा नहीं जा सका, बावजूद इसके कि उसे नामजद किया गया था। कारण कई थे- लचर न्याय व्यवस्था, पुलिस का ध्यान न देना, राजनैतिक हस्तक्षेप वगैरह। स्वप्निका के पिता को यह अंदेशा था इसलिए उन्होंने दो महीने पहले ही श्रीनिवास के खिलाफ थाने में रपट लिखा दी थी। इसी कारण के वारदात बाद पुलिस पर भारी दबाव भी बन गया था। समृद्ध बिल्डर के बेटे श्रीनिवास और उसके दो साथियों को गिरफ्तार करना पुलिस के लिए कठिन नहीं था। 24 घंटे के अंदर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया और मीडिया के सामने उन्हें पेश भी किया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार भी किया। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद तीनों मर चुके थे। कहा गया कि उन्होंने पुलिस पर तेजाब और कट्टे से हमला किया था इसलिए उन्हें मार गिराया गया। आत्मरक्षा में पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने की यह खबर जब अगली सुबह आई तो दो अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। एक प्रतिक्रिया जनता की थी जिसमें पुलिस की तारीफ की गई, दूसरी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की थी जिसमें पुलिस द्वारा कानून हाथ में लेने की निंदा की गई। यह भी खबर आई कि जब इस एनकाउंटर की बात अस्पताल में मौत से जूझ रही स्वप्निका को बताई गई तो वह भी मुस्कराई। और प्रणीता ने अपने पिता से कहा कि इससे पता चल गया कि भगवान सब देख रहा है। दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देने वालों में एक ही समानता है कि पुलिस की सफाई को कोई भी सही नहीं मानता। आम राय यही है कि लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए पुलिस ने फटाफट न्याय का यह नाटक रचा। इसके साथ छात्रों, महिला संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मीडिया में बहस शुरू हो गई। बहस में कई और मुद्दे आ गए। लड़कियों की सुरक्षा, अभिभावकों की भूमिका, पुलिस की संवेदनहीनता, न्यायिक प्रक्रिया में देरी और तुरंत न्याय देने की पुलिस की बढ़ती आदत इन सब पर चर्चा होने लगी। छात्राओं का एक बड़ा हिस्सा, खासकर व्यवसायिक कोर्स की पढ़ाई करने वाली छात्राओं का बड़ा हिस्सा इस तुरंत न्याय के तरीके की जोरदार हिमायत करने लगा। उनका मानना है कि इसी तरीके से ऐसे अपराधों को रोका जा सकता है। इन छात्राओं की एक और शिकायत है- सुरक्षा के सवाल पर लोगों का ध्यान तभी क्यों जाता है जब इस तरह की कोई भयानक वारदात हो जाती है? ऐसे बहुत सार मामले अदालतों में लटके हुए हैं, इसकी वजह से लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठा है और वे तुरंत न्याय के तरीके की हिमायत करने लगे हैं। युवा वर्ग पर सिनेमा और टेलीविजन के असर की भी खासी आलोचना हुई। फिल्मों का हीरो अक्सर अपनी पसंदीदा लड़की का दिल जीतने के लिए किसी भी हद को पार कर जाता है। बाद में उन अभिनेताओं के चहेते भी असल जिंदगी में वही रास्ते अपनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि समाजशास्त्री इस तर्क को सही नहीं मानते, उनका कहना है कि फिल्मों पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन यह एक जटिल सामाजिक समस्या है। एक तर्क यह भी है कि अगर फिल्मों का ही असर है तो फिर लड़कियां क्यों फिल्मी स्टाइल में बदला नहीं लेतीं। एक कारण यह है कि लड़कों की बर्बरता उनके दंभ में छुपी है। वे किसी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। फिल्मों और टेलीविजन की हिंसा सिर्फ उनके दुस्साहस को बढ़ाती है। परिवार नाम की संस्था ही इस प्रवृत्ति पर रोक लगा सकती है। यहीं पर अभिभावकों की भूमिका है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।ं

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