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दो टूक

करोड़ों जनता का प्रतिनिधित्व करनेवाली झारखंड विधानसभा के माननीयों की जुबान, जुमले, टीका-टिप्पणियां जनता के सामने बेलाग परोस दी जायें, तो जनता का सिर शर्म से झुक जायेगा। पर विधायकों-मंत्रियों का नहीं झुकता। क्या जनता यह स्वीकार करगी कि उनका नेता सदन में कभी किसी की मर्दानगी को ललकारता है, कभी कहता है चुप रहिए, नहीं तो पिटाइएगा। कभी वयोवृद्ध सहयोगी के बुढ़ापे को कोसता है, तो कोई किसी की जुबान पर लगाम लगाने की नसीहत दे डालता है। यह सदन है या मछली बाजार? इन झक, सफेद कुर्ते के अंदर कितनी कालिख है भाई। नये और निर्दलीय विधायकों की जुबान ज्यादा फिसलती देखी गयी है। आचरण और लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ नेतृत्व का अवसर पानेवाले ऐसे माननीयों की बदजुबानी और धृष्ठ आचरण में सुधार नहीं हुआ, तो इनकी राजनीतिक उम्र घटने में भला कितना समय लगेगा?

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