अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कलम, कैमरा और बलात्कार

याद कीािए 15 अक्तूबर, 2003 का वह दिन जब न्यूज मीडिया के हाथ एक धमाकेदार खबर लगी थी। खबर थी- सिरीफोर्ट आडिटोरियम के पास स्विटजरलैंड की एक राजनयिक से बलात्कार। खबर कई वजहों से ‘खबर’ लायक बनी। एक, घटना का दक्षिणी दिल्ली के पॉश इलाके में होना। दूसरे, विदेशी महिला से बलात्कार। तीसरे, घटना का उस समय होना जब दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह चल रहा था। और चौथे, पीड़ित का यह शक जाहिर करना कि अपराधी किसी उच्च वर्ग से ताल्लुक रखने वाला दिखता था क्योंकि वह ‘फर्राटेदार अंग्रेजी’ बोल रहा था। लिहाजा यह घटना बड़ी बनी। मीडिया इस घटना को पूरे मसाल के साथ उछालता है और दिन पहले दिल्ली के बुद्धा जयंती पार्क में राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्डो के हाथों हुए बलात्कार से जोड़ कर दिल्ली को महिलाओं के लिए अत्यधिक असुरक्षित घोषित कर देता है। अब ताजा खबर यह है कि दिल्ली पुलिस ने हाल ही में दिल्ली की एक अदालत में इस केस को बंद कर देन की सिफारिश की है क्योंकि पांच साल बाद भी इस घटना के आरोपी तक पहुंचा नहीं जा सका है। पुलिस को 11 ऐसे मोबाइल फोनों की जानकारी तो मिलती है जो कि घटना के समय इलाके के पास ही सक्रिय थे लकिन अपराधी का कुछ पता नहीं चला। पुलिस ने दक्षिण़्ाी दिल्ली के संभ्रांत इलाकों में रहने वाले अमीर लकिन बिगड़े और अंग्रेजी बोलने वाले साहबजादों की सूची भी तैयार की लकिन कामयाबी नहीं मिली। अब मामला सिर्फ यह नहीं है कि इस केस को खत्म क्यों किया जा रहा है? मामला यह भी है कि पांच साल पहले इस घटना के घटने पर मीडिया जितना सक्रिय और चिंतित दिखाई दिया था, अब उस चिंता का कोई अंश भी दिखाई क्यों नहीं दे रहा? क्या मामल की गंभीरता कम हो गई है या यह कि मीडिया को घटनाओं को फॉलो करन की आदत अभी ही पड़ नहीं सकी है। भारत में हर साल बलात्कार के 15000 से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं और हर तीन मिनट में एक महिला को शिकार बनाया जाता है। अपराध क्यों होता है, इस पर सामाजिक-वैज्ञानिक स्तर वैचारिक मंथन की परंपरा भी कुछ हद तक दिखाई देती है, लकिन जो पहलू सबसे ज्यादा उपेक्षित लगता है- वह है बलात्कार के कवरेा को लेकर मीडिया का रवैया। एक सच बलात्कार से जुड़ी श्रेणियों का भी है। बलात्कार का कवरेा पीड़ित के क्लास, जगह, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शहर, शैक्षिक योग्यता वगैरह के आधार पर जगह और प्राथमिकता पाती है। आरोपी की पृष्ठभूमि भी काफी मायने रखती है। बलात्कार जब तक ठोस खबर की वजह नहीं बनता, वह मीडिया की नजरों से अछूता रहता है और कई बार न्याय पाने में भी पिछड़ जाता है। ऐसे तमाम बलात्कार, जो कि मीडिया को किसी भी तरह स कौतूहल बनाने लायक लगते रहे हैं, की कवरेा भरपूर रस के साथ की जाती रही है। मौलाना आजाद कालेज का बलात्कार मामला (15 नवंबर, 2002) मध्यमवर्गीय पढ़ी-लिखी युवती का था, जिससे बलात्कार पुलिस मुख्यालय के एकदम करीब हुआ था। दिल्ली में ही राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्डो ने जब बुद्धा गार्डन में एक युवती से बलात्कार किया तो उसे मीडिया ने खूब जगह दी। यह मामला भी कुछ ही घंटों में सुलझा लिया गया। इसी तरह जयपुर में एक विदेशी महिला के बलात्कार के मामले पर तो फास्ट कोर्ट का ही गठन कर दिया जाता है और अपराधियों को चुटकियों में सजा दे दी जाती है लकिन दूसरी तरफ गरीब बस्तियों में होने वाले बलात्कार बमुश्किल दो कालम की खबर बन पाते हैं। एक तो मीडिया इन्हें ‘खास’ नहीं मानती और दूसरे इसमें चटखारे लेने लायक कुछ नहीं होता। वैसे भी मीडिया ऐसे वर्ग से जुड़े अपराधों को कवर करने में दिलचस्पी लेता है जिससे वह खुद का जुड़ाव महसूस करता हो। चूंकि मीडिया में एक बड़ी हिस्सेदारी मध्यम या उच्च वर्ग के पत्रकारों की है, इसी श्रेणी स कवरेा ज्यादा तवज्जो भी पाती है। मीडिया के इस रवैय को पुलिस भी पहचानने लगी है। यही वजह है कि निम्न वर्ग पर हुए आपराधिक मामले आज भी थानों में आसानी से दर्ज नहीॅ हो पाते। अगर दर्ज होते भी हैं तो बड़े सच को छोटे में तब्दील कर दिया जाता है। यहां बलात्कार को अक्सर ‘छेड़छाड़’का मामला बना दिया जाता है और फर्ज निभ जाता है। यह भी सच है कि अपराध से जुड़े तमाम कार्यक्रमों में जगह और रंग भरन के लिए बलात्कार सबसे ज्यादा काम में आता है। इस संगीन अपराध की रिपोर्टिग में गंभीरता की एक सिर से अनुपस्थिति बलात्कार की त्रासदी को बढ़ा देती है। बलात्कार-धमाके-अपराध- इन सब पर क्षणिक तात्कालिक-टीआरपी आधारित रिपोर्टिग के बीच झूलते-झूलते भूलना अब हमारी फितरत में शामिल होने लगा है।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: कलम, कैमरा और बलात्कार