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महावत की हँसी, और महामंदी में फँसा देश

ोशल नरेश प्रसेनजित के पास पायेक्का नामक एक परम बलशाली और बुद्धिमान् हाथी था। माना जाता था कि अगर महाराज पायेक्का की पीठ पर सवार हैं, तो युद्ध में और कोई जीत ही नहीं सकता था। पायेक्का की एक चिंघाड़ ही बड़े-बड़ों से मैदान छुड़वा दिया करती थी। समय के साथ पायेक्का बूढ़ा हो चला, पुराना महावत भी सेवानिवृत्त होकर अपने गॉंव लौट गया। बूढ़ा पायेक्का एक दिन पास के तालाब में नहाने को गया और तालाब के कीचड़ में बुरी तरह जा फॅंसा। हाथी को बाहर लाने की कई तरकीबें आजमाई गईं। उसे खाने का लालच दिया गया, डंडे का डर दिखाया गया, लेकिन कीचड़ से गजराज को कोई नहीं निकाल सका। पायेक्का बार-बार जोर लगाता, पर उबरने की बजाए दलदल में कुछ और धॅंस जाता। खबर पाकर महाराज भी अपने प्यार हाथी को देखने आए। पायेक्का की ऑंखों से बहते आँसू और उसकी दुर्दशा देखकर वे बड़े दु:खी हुए। महाराजा का दु:ख देखकर भारी मात्रा में जुटे तमाशबीन भी रोने लगे। होते-होते खबर पायेक्का के पुराने महावत तक पहुँची जो उन दिनों अनाथपिण्डक सेठ के जेतवनाराम में बुद्ध की शरण में धम्म का पाठ पढ़ रहा था। बुद्ध ने उसे पायेक्का को दलदल से उद्धार करने को भेज दिया। घटनास्थल पर पहुॅंच कर महावत दलदल में फॅंसे असहाय हाथी को देखकर पहले तो खूब हॅंसा, फिर उसने राजसैनिकों को युद्ध का बिगुल बजवाने का आदेश दिया। ज्यों ही रणभेरियॉं बजीं, पायेक्का अपनी खोई पुरानी आवाज में ऐसा चिंघाड़ा कि पूरी श्रावस्ती गूॅंज उठी। और चिंघाड़ते हुए पायेक्का अपनी सहा पुरानी मस्ती और फुर्ती से दलदल से यूॅं बाहर निकल आया ज्यों कभी फॅंसा ही न हो।ड्ढr भीड़ में शामिल भिक्खुओं ने बाद को बुद्ध से पूछा कि भला महाराजा के विपरीत महावत कीचड़ में फँसे अपने दुलार हाथी की दुर्दशा देखकर दु:खी होने की बजाए क्यूँ हंसा? और उसे दण्ड या प्रलोभन देने की बजाए उसने युद्ध के बिगुल क्यूं बजवाए? बुद्ध का जवाब था, कि महावत इसलिए हँसा कि उसने पाया कि अनेक युद्ध जीत चुका हाथी भी कैसे अपना मूल स्वभाव और महान अतीत भुला कर एक छोटे से तालाब के कीचड़ में फॅंस कर रोने लगता है। और उसने बिगुल इसलिए बजवाया कि हाथी को अपना मूल स्वभाव और वह जुझारू इतिहास एक बार फिर याद आ जाए। और वह इस अपमानजनक दशा से एक झटके में उबर जाए। इन दिनों मंदी और आतंकवाद के दलदल में फॅंसा भारतीय अर्थजगत भी पायेक्का की गति को प्राप्त हो गया दिखाई देता है। सचाई यह है कि यह तालाब उथला है। फिर भी हमार कोसलाधीस गमगीन हैं और अर्थजगत के गुणी-ज्ञानी या तो छाती पीट हताशा और परस्पर आरोप-प्रत्यारोप में लीन हैं, या फिर किनार पर खड़े-खड़े ‘बेल आउट पैकेा’ का लालच या ताडना का डर दिखा कर दलदल में फॅंसे पायेक्का को कह रहे हैं, उठ! उठ! बाहर निकल। और बेचारा पायेक्का है कि बाहर आने की बजाए अपने चारों ओर व्याप्त डर, हताशा और पछतावे से अचकचा कर लगातार और भी गहर धँसता जा रहा है। और इस संदर्भ में यह भी जोड़ दें कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कोष ने पिछली आधी सदी (10-2007) के दौरान 122 बार आई विभिन्न किस्तों की मंदी का जो लेखा-ाोखा बनाया है, उसके अनुसार मंदी एक अथाह सागर नहीं होती। अब तक उसके हर चक्र की औसत उम्र करीब 6 महीने से तीन साल तक ही ठहरती है। इस घड़ी सहानुभूति अथवा फटकार की जरूरत नहीं। पहली जरूरत है कि हम तालाब का उथलापन स्वीकार करं। और फिर पायेक्का को बताएं कि उसका मूल स्वभाव और शक्ित शहरी मध्यवर्ग और ग्रामीण खेतिहर समाज की बुनियादी जरूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं से ही बना है। वॉलस्ट्रीट या नासडैक ने उसे नहीं गढ़ा। उसके हाउसिंग या बैंकिंग क्षेत्रों की दशा भी अमेरिका जसी नहीं, जहॉं आम और खास दोनों तरह के आदमी की जीवनशैली और बचत लगभग पूरी तरह क्रेडिट और लोन क्षेत्रों पर टिकी हुई थी। यह सही है कि हमार यहॉं भी शेयर बाजार भारी (50 प्रतिशत तक) गिरावट का शिकार बना है, लेकिन पूछिए कि पायेक्का की कितनी पूॅंजी उसमें लगी है? लगभग नगण्य। विशेषज्ञ एकमत हैं, कि भारत में ग्लोबल मंदी की चपेट से हमारी सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर में करीब 2 प्रतिशत तक की ही गिरावट आएगी, और इसके बाद भी भारत की उत्पाद दर अधिकतर देशों से कहीं ऊॅंची बनी रहेगी। ताजा स्थिति यह है कि दिसंबर आते-आते (अगस्त की 12.प्रतिशत से) गिरकर महॅंगाई दर 6.84 प्रतिशत पर आ गई है। सेंसेक्स दस हाारी हो गया है और यूरो तथा शेयर बाजार की मजबूती के चलते रुपया 72 पैसा उठ गया है। उधर तेल के दाम लगातार घट रहे हैं, लिहाजा यातायात, परिवहन और आनुषंगिक क्षेत्रों में भी लगातार राहत बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। वित्तमंत्रालय के अनुसार अब ब्याज दरं और नर्म होंगी और इससे छोटे तथा मॅंझोले उद्योगों को राहत मिलेगी। देश की बड़ी रियल एस्टेट कंपनियॉं डी.एल.एफ. और यूनिटेक लिमिटेड भी अब 200में 30 से 50 लाख की कीमत के दस हाार भवन बनाने जा रही हैं जो गुड़गॉंव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा से लेकर कोलकाता तथा चेन्नई तक में मध्यवर्गीय परिवारों को उपलब्ध होंगे। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अभी हाल में पॉंच हाार फ्लैटों के आबंटन के लिए जो लॉटरी खोली, उसके लिए उसे पाँच लाख आवेदन पूर देश से मिले। लॉटरी पाने वालों के हर्ष और न पाने वालों के अवसाद और आक्रामक नारबाजी से स्पष्ट था, कि कम कीमत के मकानों के लिए देश में कितनी भारी माँग मौजूद है। जिन चार लाख पिचानवे हाार लोगों को मकान नहीं मिला, उनकी संख्या को भारत के बीस बड़े शहरों से गुणा कीािए तो बाजार के विशाल फैलाव को जान कर आपके कानों में भी बड़ी एस्टेट कंपनियों की ही तरह पायेक्का के महावत की हॅंसी गूॅंजने लगेगी। हाउसिंग और निर्माण क्षेत्र में और जान फॅूंकने के लिए राज्य सरकारों को इस वक्त जनता की मॉंग और वक्त की जरूरत समझ कर राज्य की अतिरिक्त सरकारी जमीन को बिक्री के लिए पेश कर देना चाहिए। इससे अनाप-शनाप रूप से बढ़ाए गए जमीन के दाम तो फिर जमीन पर लौटेंगे ही हर नागरिक के लिए सर पर अपनी छत का वह सपना साकार होगा, जो हर भारतीय के मूल स्वभाव में जन्मना मौजूद होता है। कुल मिलाकर इस घड़ी में अर्थव्यवस्था के हितैषियों को बताना चाहिए कि सामान्य हैसियत वाली अस्सी फीसदी आबादी भारतीय बाजार के माल की सबसे बड़ी (67 प्रतिशत) खरीदार है। और मुट्ठीभर ऊॅंची हैसियत वालों की तरह विदेशी पूॅंजी के पलायन या स्टॉक मार्केट के पतन से आम भारतीय की बचत या क्रय शक्ित पर खास फर्क नहीं पड़ा है, क्योंकि शेयर मार्केट, इम्पोर्टेड माल या एक्सपोर्ट कं. से उसका कभी लेना-देना रहा ही नहीं। लेकिन हाँ यह हम भारतीय बाजार के स्वभाव की एक भीगी सुतली सरीखी गाँठ से टकराते हैं, जो जरूरत से अधिक शंकालु, जोखिम-विमुख और भ्रमण विरोधी है। गौर से देखें, तो यही गाँठ भारत की दरिद्रता की बड़ी वजह रही है। और अगर यह खोल ली गई, तो तरक्की की कई नई राहें खुल सकती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री और स्तंभकार पॉल क्रुगमैन ने अपने भाषण में हमार ऐसों को दो बुनियादी सलाहें दी हैं : एक, हम प्रश्नों पर भी प्रश्न उठाएॅं। और दो, कभी ऊटपटांग सुनाई पड़ने वाली नई बातें कह कर उपहास का पात्र बनने का जोखिम भी उठाएॅं। इस बार इस स्तंभ में हम यही कर रहे हैं।

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