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‘चिताओं के बच्चों’ के सच को दिखाती एक फिल्म

ाहां हर 10 मिनट में जलाने के लिए पूरे भारत से शव लाए जाते हों, वहां किसी फिल्मकार ने लगभग 18 महींने बिता दिए हों, सुनकर ताज्जुब होता है। लेकिन फिल्मकार राजेश जाला के इसी प्रयास ने उनकी फिल्म ‘चिल्ड्रन ऑफ द पायर’ (चिता के बच्चे) को इस साल दुनिया के कई प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में पुरस्कार और तारीफ दिलवायी है। बनारस के मणिकर्णिका घाट के नजदीक रहने वाले और शवों को जलाने के काम में लगे डोम जाति के 6 बच्चों के इर्द गिर्द ही उन्होंने कई महींने बिताए और लगातार फिल्माते रहे। यह भावनात्मक और शारीरिक दृष्टि से एक कठिन काम था लेकिन नतीजा संतोषजनक रहा। मांट्रियल फिल्म फेस्टीवल (कनाडा) और साओ पाओलो फिल्म फेस्टीवल (ब्राजील) में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार के अलावा इस फिल्म को पूसान, लिपजिग जसी कई प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टीवल में दिखाया गया। गंगा किनार बसे दुिनया के इस सबसे बड़े श्मशान भूमि (मणिकर्णिका घाट) के नजदीक रहने वाले इन बच्चों के पेट की आग यहां हर वक्त जलने वाली चिताओं की आग को जलाए रखने से ही ठंडी होती है। कफन चुराकर भागना और बाजार में बेच आना इनकी दिनचर्या है। वे कहते हैं ‘ करीब दो साल पहले मैं नई फिल्म के लिए विषय खोजने बनारस गया और जब मणिकर्णिका घाट पर इन बच्चों को देखा तो उसी वक्त इस फिल्म का विचार दिमाग में आया। प्रतिदिन 150 से अधिक मृत व्यक्ितयों के अंतिम संस्कार के काम में लगे डोम जाति के हर उम्र के लोगों में से मैंेने इन 7 बच्चों की जिंदगी को नजदीक से दिखाना चाहा। इन की पूरी जिंदगी इस श्मशान भूमि और जलने वाली चिताओं के इर्द गिर्द घूमती है।’ करीब 10 साल से डॉक्यूमेंर्ट्ी और सीरियल बना रहे राजेश की पिछली फिल्म ‘फ्लोटिंग लैंप ऑफ द शेडो’ वैली भी कई फेस्टीवल में दिखाई गई और इसे डिस्कवरी चैनल ने प्रसारित किया। जसा कि एक अंतररा,्ट्रीय आलोचक ने लिखा, ‘ बहुत कम फिल्में एसी हैं जो धरती पर ही बसे कई नर्क को बच्चों के दृष्टिकोण से देखती हो। जाला की फिल्म उनमें से एक है।’

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  • Web Title: ‘चिताओं के बच्चों’ के सच को दिखाती एक फिल्म