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रिश्ते ही रिश्ते

हिन्दुस्तान में रिश्तों की भरमार है। अंग्रेजी दां जानते हैं कि अंग्रेजी इसी कारण हिन्दी से बेहतर भाषा है। वहां अंकल-आण्टी, फादर-मदर-इन लॉ में सब निबट जाता है। यह कम्बख्त ऐसा देश है कि चाचा, ताऊ, ससुर, मौसी, मौसा, देवरानी-ोठानी जसे संबंधियों की एक अंतहीन चेन है। अगर तुलसीदास जी इस बार में चेते होते तो जरूर लिखते- ‘जय अनंत सम्बन्ध अनन्ता’। इतना ही नहीं, बुजुर्गो को सम्मान देने की एक निर्धारित प्रक्रिया है। कोई बड़ा दिखा नहीं कि उसके चरणों पर झुक पड़ो। हमार पिताजी तो आशा करते थे कि शादी-ब्याह में बैठे पोपले, छड़ीदार, खांसते-कराहते जितने भी उमरदार नजर आएं, सर और कमर झुकाए, उनके चरण स्पर्श करते गुजर जाएं। कमर सीधी करने का मौका तक न मिले। यह वर्जिश पहले हो जाती थी। अब तोंद आड़े आती है। नतीजतन, यह नाटकीय कसरत बमुश्किल हो पाती है। फिर भी चरण-छू रीत है मुल्क की। वर्ना जग हंसाई का डर है। जबरन ‘कमर झुकाई’ कभी-कभी करनी ही पड़ जाती है हालांकि हाथ, पैर के बजाय घुटने तक, बमुश्किल पहुंच पाता है। हम नई पीढ़ी से रश्क करते हैं। वह तकदीर वाली है। परम्परा के इस बेकार के भार से कतई मुक्त है। बड़े-बूढ़े तो दूर, वह अपने मां-बाप को भी मदर्स-फादर्स डे पर ही याद करती है। पेट काटकर संतान को पढ़ाना-लिखना, माता-पिता का कर्तव्य है। उसके बाद उनकी उपेक्षा संतान का जन्मजात अधिकार। इसमें शिकायत क्या? यह तो आधुनिकता की मांग है। पहचान है। दकियानूसी हथकड़ी-बेड़ी कोई कब तक झेले-सहे। जानबूझ कर कौन अपने समकालीनों के बीच उपहास का पात्र बनना चाहेगा? किसे पता आतताई कब ढिंढोरा पीटें कि ‘सुना तुमने, पाषाण युग का प्रतिनिधि यह पप्पू जो है, अपने डैडी-ममी को साथ रखता है घर में!’ अपनी शिक्षा-प्रणाली भी गजब की है। हमने जानवरों से भी करीबी रिश्ता-नाता जोड़ रखा है। बिल्ली को मौसी बुलाने का क्या तुक है? मौका मिले तो वह मतलबी अपने मालिक की आंखें नोंचने तक से परहेा न कर। एक बाल कथा में हमने भालू का ‘भैया’ संबोधन भी देखा है। अगर ऐसे पाठक बच्चे भालू के हत्थे चढ़े तो वह उन्हें नोंच-काट कर फेंकने से बाज न आए। वह तो गनीमत है कि जंगल अब करीब-करीब लुप्त हैं। पर अब जानवरों की जरूरत ही क्या है? आज शहरों के जंगल हैं और जानवरों से इंसान जो अपनों के ही खून के प्यासे हैं। संबंधों के साधकों ने तो आसमान को भी नहीं छोड़ा था। हमें खुशी है। वैज्ञानिकों की इनायत है। उन्होंने चंदा-मामा की पोल खोल दी है वर्ना जब भी चांद का जिक्र छिड़ता था तो हमें कंस याद आते थे।ं

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