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हवा में युद्ध

हो चाहे न हो पर मीडिया विशेषकर चैनलों ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का नाटक शुरू कर दिया है। कहीं तीन मिनट में युद्ध होने वाला है, कहीं तीन घंटे में, तो कहीं नाभिकीय युद्ध की रूपरेखा प्रस्तुत की जा रही है। नई पीढ़ी ने भारत-पाक युद्ध नहीं देखा है, खास तौर पर चैनलों की दीवानी युवा पीढ़ी ने बिल्कुल नहीं। आखिर इराक युद्ध दिखा कर ही सीएनएन इतना ऊपर चढ़ा, इसलिए मंदी के इस दौर में दोनों देशों की सरकारें भिड़ें और फुटेा बने यह माहौल मीडिया के न्यूजरूमों में बन रहा है। 24 घंटे चलने वाले पचासों समाचार चैनलों के बीच काल्पनिक समाचार पैकेा की ऐसी संक्रामक प्रतिस्पर्धा है कि अगर यह ‘वार फ्लू’ किसी एक चैनल पर दिखाई पड़ा तो स्वस्थ पत्रकारिता के घरानों को भी बीमार पड़ने में देर नहीं लगती। चिंता की बात यह है कि युद्ध की यह हवा भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी वैसी ही बहाई जा रही है। कभी भारतीय विमान के सीमा में घुसने, तो कभी प्रणव मुखर्जी के जरदारी को ‘फोन’ किए जाने के बहाने उन्मादी माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। स्थिति यह है कि दोनों देशों के राजनेता, अफसर और सैन्य अधिकारी भले एक दूसर से ठंडे दिमाग से बात कर रहे हों पर मीडियाकर्मी तल्खी दिखाने और उसे बढ़ाने को ही अपना धर्म मान रहे हैं। कहा जा रहा है कि पिछले दो दशकों में भारत और पाक के बीच युद्ध के कम से कम छह मौके आए पर दोनों तरफ के मीडिया के संबंध इतने खराब कभी नहीं रहे, जितने आज हो गए हैं। आखिर मीडिया के इस स्थिति में पहुंचने की क्या वजह हो सकती है? क्या इसके पीछे टीआरपी का अर्थशास्त्र है? या जनभावनाओं का समाजशास्त्र है? या फिर मीडिया और युद्ध की नई टेक्नालॉजी के प्रयोग का कोई दबाव है? वजह चाहे जो भी हो पर मीडिया की वफादारी बाजार, सरकार और देश से भी ज्यादा जनहित के प्रति होनी चाहिए, जिसके मुखर दावे वह अपने सिद्धांतों में करता भी रहता है। दरअसल, मीडिया वास्तव में आजाद तभी है, जब वह राज्य ही नहीं मुनाफे के दबाव से भी मुक्त हो। आतंकवाद पड़ोसी सरकार की ओर से थोपा गया एक तरह का युद्ध ही है, पर इस सीमित युद्ध के विरोध का तरीका भी खुला और विनाशकारी युद्ध कैसे हो सकता है? आज जरूरत इस बात की है कि मीडिया अपनी ताकत का इस्तेमाल, युद्ध का माहौल बनाने के बजाय, दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में कर।

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  • Web Title: हवा में युद्ध